श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 13: ध्रुव महाराज के वंशजों का वर्णन  »  श्लोक 46

 
श्लोक
कदपत्यं वरं मन्ये सदपत्याच्छुचां पदात् ।
निर्विद्येत गृहान्मर्त्यो यत्‍क्‍लेशनिवहा गृहा: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
कद्-अपत्यम्—कुपुत्र; वरम्—श्रेष्ठ; मन्ये—मैं सोचता हूँ; सत्-अपत्यात्—अच्छे पुत्र की अपेक्षा; शुचाम्—शोक का; पदात्—साधन; निर्विद्येत—विरक्त हो जाता है; गृहात्—घर से; मर्त्य:—मरणशील मनुष्य; यत्—जिसके कारण; क्लेश निवहा:—नारकीय; गृहा:—घर ।.
 
अनुवाद
 
 तब राजा ने सोचा : सुपुत्र की अपेक्षा कुपुत्र ही अच्छा है, क्योंकि सुपुत्र से घर के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है, किन्तु कुपुत्र से नहीं। कुपुत्र घर को नरक बना देता है, जिससे बुद्धिमान मनुष्य सरलता से अपने को अनासक्त कर लेता है।
 
तात्पर्य
 राजा अपने भौतिक घर के प्रति लगाव और विरक्ति के रूप में सोचने लगा। प्रह्लाद महाराज के अनुसार भौतिक घर अंधकूप के समान है। यदि मनुष्य अंधे कुएँ में गिर जाता है, तो उसके लिए निकल पाना और जीवित रहना कठिन है। अत: प्रह्लाद महाराज ने सलाह दी है कि जितनी जल्दी हो सके मनुष्य इस घरेलू जीवन रूपी अंधकूप को त्याग कर जंगल में जाकर भगवान् की शरण ग्रहण कर ले। वैदिक सभ्यता के अनुसार वानप्रस्थ तथा संन्यास में गृहत्याग अनिवार्य है। किन्तु लोग गृह के प्रति इतने
आसक्त रहते हैं कि वे अन्त समय तक भी गृहस्थ-जीवन को नहीं छोडऩा चाहते। अत: राजा अंग ने विरक्ति को ध्यान में रखते हुए कुपुत्र को गृहस्थ-जीवन से विरक्ति के लिए प्रेरणाप्रद मान लिया। वह कुपुत्र को अपना मित्र मानने लगा, क्योंकि वह घर से विरक्ति में राजा का सहायक हो रहा था। अन्तत: प्रत्येक मनुष्य को सीखना पड़ता है कि गृहस्थ जीवन से कैसे विरक्त हुआ जाये, अत: यदि कुपुत्र अपने बुरे आचरण के द्वारा गृहस्थ के गृहत्याग में सहायक बनता है, तो यह वरदान है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥