श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 14: राजा वेन की कथा  »  श्लोक 16

 
श्लोक
स ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षण: ।
यस्मिन् विनष्टे नृपतिरैश्वर्यादवरोहति ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—आध्यात्मिक जीवन; ते—तुम्हारे द्वारा; मा—मत; विनशेत्—विनष्ट होने दें; वीर—हे वीर; प्रजानाम्—लोगों का; क्षेम- लक्षण:—सम्पन्नता का कारण; यस्मिन्—जो; विनष्टे—नष्ट होने पर; नृपति:—राजा; ऐश्वर्यात्—ऐश्वर्य से; अवरोहति—नीचे गिरता है ।.
 
अनुवाद
 
 मुनियों ने आगे कहा : अत: हे महान् वीर, आपको सामान्य जनता के आध्यात्मिक जीवन को विनष्ट करने में निमित्त नहीं बनना चाहिए। यदि आपके कार्यों से उनका आध्यात्मिक जीवन विनष्ट होता है, तो आप निश्चित रूप से अपने ऐश्वर्यपूर्ण तथा राजोचित पद से नीचे गिरेंगे।
 
तात्पर्य
 प्राचीन काल में, विश्व के प्राय: सभी भागों में राजतंत्र था, किन्तु धीर-धीरे जैसे-जैसे आदर्श धार्मिक जीवन से इन्द्रियतृप्ति के ईश्वर-विहीन जीवन में राजतंत्र का पतन होता गया, विश्व भर से राजतंत्र
हटता गया। किन्तु जब तक सरकारी व्यक्ति धार्मिक न हों और महान् धार्मिक पुरुषों के पद-चिह्नों का अनुसरण न करें, तब तक राजतंत्र को मिटाकर उसके स्थान पर प्रजातंत्र को लाना पर्याप्त न होगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥