श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 14: राजा वेन की कथा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.14.19 
तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावन: ।
परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उससे; राज्ञ:—राजा; महा-भाग—हे श्रेष्ठ; भगवान्—भगवान्; भूत-भावन:—जो इस दृश्य जगत का मूल कारण है; परितुष्यति—प्रसन्न हो जाता है; विश्व-आत्मा—सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का परमात्मा; तिष्ठत:—स्थित होकर; निज-शासने—अपने शासन में ।.
 
अनुवाद
 
 हे महाभाग, यदि राजा यह देखता है कि दृश्य जगत के मूल कारण भगवान् तथा हर एक के भीतर स्थित परमात्मा की पूजा होती है, तो भगवान् प्रसन्न होते हैं।
 
तात्पर्य
 यह वास्तव में सरकार का ही कर्तव्य है कि वह देखे कि प्रजा तथा सरकार दोनों के ही कार्यों से भगवान् तुष्ट रहें। यदि सरकार या प्रजा को भगवान् का, जो कि दृश्य जगत के मूल कारण हैं, कोई अनुमान नहीं होता अथवा विश्वात्मा अर्थात् प्रत्येक आत्मा का परम आत्मा अथवा भूतभावन का ज्ञान नहीं होता तो सुख की कोई सम्भावना नहीं रहती। निष्कर्ष यह निकला कि बिना भक्ति किये न तो प्रजा और न सरकार किसी प्रकार भी सुखी रह सकती है। आज के समय में न तो राजा और न सरकार की रुचि इस ओर है कि लोग भगवान् की भक्ति करते हैं अथवा नहीं। अपितु उनकी रुचि इन्द्रियतृप्ति के साधनों के और बढ़ाने में ही है। फलस्वरूप वे प्रकृति के कठिन नियमों की जटिल मशीनरी द्वारा दिन-प्रति-दिन जकड़ते जा रहे हैं। लोगों को प्रकृति के तीनों गुणों से मुक्त किया जाना चाहिए और इसकी एकमात्र विधि है भगवान् के चरणों में आत्मसमर्पण करना। इसका उपदेश भगवद्गीता में दिया हुआ है। दुर्भाग्यवश इसका ज्ञान न तो सरकार को है और न जनता को; वे तो मात्र इन्द्रियतृप्ति में एवं जीवन में सुखी रहने में रुचि रखते हैं। निज शासने शब्द सूचित करता है कि वर्णाश्रम धर्म पालन के लिए सरकार तथा प्रजा दोनों उत्तरदायी हैं। यदि जनता एक बार वर्णाश्रम धर्म में प्रवृत्त हो ले तो पूरी सम्भावना है कि इस संसार में तथा अगले जीवन में वास्तविक जीवन तथा सम्पन्नता दोनों ही प्राप्त हो।
 
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