श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 14: राजा वेन की कथा  »  श्लोक 43

 
श्लोक
विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपते: ।
ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्बाहुको नर: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
विनिश्चित्य—निश्चय करके; एवम्—इस प्रकार; ऋषय:—ऋषियों ने; विपन्नस्य—मृत; मही-पते:—राजा का; ममन्थु:—मंथन किया; ऊरुम्—जंघाएँ; तरसा—विशिष्ट शक्ति से; तत्र—तत्पश्चात्; आसीत्—उत्पन्न हुआ; बाहुक:—बाहुक (बौना) नामक; नर:—व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 इस निश्चय के बाद, साधु पुरुषों तथा मुनियों ने राजा वेन के मृत शरीर की जाँघों का अत्यन्त शक्तिपूर्वक तथा एक विशेष विधि से मंथन किया। मंथन के फलस्वरूप राजा वेन के शरीर से एक बौने जैसा व्यक्ति उत्पन्न हुआ।
 
तात्पर्य
 राजा वेन की जांघ के मंथन से एक व्यक्ति का उत्पन्न होना यह बताता है कि आत्मा व्यष्टि है और शरीर से पृथक् रहता है। ऋषि तथा मुनि राजा वेन के मृत शरीर से एक दूसरा व्यक्ति उत्पन्न कर सके, किन्तु वे मृत राजा को जीवित नहीं कर सके। राजा वेन का निधन हो चुका था और उसने निश्चय ही दूसरा शरीर ग्रहण कर लिया था। साधु पुरुषों तथा मुनियों को वेन के शरीर से ही सरोकार था क्योंकि वह महाराज ध्रुव की वंश-परम्परा में था। अत: जिन अवयवों से दूसरा शरीर उत्पन्न किया जा सका, वे राजा वेन के मृत शरीर में विद्यमान थे। जब मृत शरीर की दोनों जाँघों को विशेष विधि से मथा गया तो एक दूसरा शरीर
उत्पन्न हो गया। यद्यपि वेन का शरीर मृत था, किन्तु उसकी माता ने उसे मंत्रों तथा ओषधियों से सुरक्षित कर रखा था। फलत: नवीन शरीर उत्पन्न करने के लिए समस्त अवयव उपस्थित थे। अत: जब राजा वेन के मृत शरीर से बाहुक नामक व्यक्ति का शरीर प्रकट हुआ तो यह बहुत आश्चर्यजनक न था। यह तो केवल इसे प्राप्त करने की विधि जानने का प्रश्न था। एक शरीर के वीर्य से दूसरा शरीर उत्पन्न होता है और इसमें आत्मा के निवास करने से जीवन के लक्षण दिखाई देते हैं। कोई यह न सोचे कि महाराज वेन के मृत शरीर से दूसरा शरीर उत्पन्न करना असम्भव था। मुनियों ने अत्यन्त कौशल से यह कार्य सम्पन्न किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥