श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 14: राजा वेन की कथा  »  श्लोक 6

 
श्लोक
न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजा: क्‍वचित् ।
इति न्यवारयद्धर्मं भेरीघोषेण सर्वश: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; यष्टव्यम्—एक भी यज्ञ हो पाते; न—न तो; दातव्यम्—कोई दान दे सकता था; न—नहीं; होतव्यम्—आहुति दी जा सकती थी; द्विजा:—हे द्विजन्मा; क्वचित्—किसी भी समय; इति—इस प्रकार; न्यवारयत्—रोक दिया; धर्मम्—धार्मिक नियमों की विधियाँ; भेरी—ढिंढोरा (बाजा); घोषेण—शब्द से; सर्वश:—सर्वत्र ।.
 
अनुवाद
 
 राजा वेन ने अपने राज्य में यह ढिंढोरा पिटवा दिया कि सभी द्विजों (ब्राह्मणों) को अब से किसी भी तरह का यज्ञ करने, दान देने या घृत की आहुति देने की मनाही कर दी गई। दूसरे शब्दों में, उसने सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान बन्द करा दिये।
 
तात्पर्य
 जो कुछ राजा वेन ने हजारों वर्ष पूर्व किया था वह आज सारे संसार में नास्तिक सरकारों द्वारा किया जा रहा है। विश्व की स्थिति ऐसी नाजुक है कि कोई भी सरकार किसी भी समय धार्मिक अनुष्ठानों को बन्द करने की घोषणा कर सकती है। अन्तत: स्थिति
इतनी गिर जाएगी कि इस लोक में पवित्र मनुष्यों के लिए जीना दूभर हो जाएगा। अत: बुद्धिमान मनुष्यों को चाहिए कि गम्भीरतापूर्वक कृष्णभक्ति करें जिससे वे इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त और अधिक कष्ट उठाये बिना भगवान् के धाम को जा सकें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥