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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 15: राजा पृथु की उत्पत्ति और राज्याभिषेक  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.15.22 
पृथुरुवाच
भो: सूत हे मागध सौम्य वन्दिँ-
ल्लोकेऽधुनास्पष्टगुणस्य मे स्यात् ।
किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतां
मा मय्यभूवन्वितथा गिरो व: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
पृथु: उवाच—राजा पृथु ने कहा; भो: सूत—हे सूत; हे मागध—हे मागध; सौम्य—भद्र; वन्दिन्—हे प्रार्थनारत भक्त; लोके— इस जगत में; अधुना—इस समय; अस्पष्ट—अप्रकट; गुणस्य—जिसके गुण; मे—मेरे; स्यात्—होवें; किम्—क्यों; आश्रय:— शरण; मे—मेरा; स्तव:—प्रशंसा; एष:—यह; योज्यताम्—प्रयुक्त हो सके; मा—कभी नहीं; मयि—मुझमें; अभूवन्—थे; वितथा:—वृथा; गिर:—शब्द; व:—तुम्हारे ।.
 
अनुवाद
 
 राजा पृथु ने कहा : हे भद्र सूत, मागध तथा अन्य प्रार्थनारत भक्तो, आपने मुझमें जिन गुणों का बखान किया है, वे तो अभी मुझमें प्रकट नहीं हुए। तो फिर आप मेरे इन गुणों की क्यों प्रशंसा कर रहे हैं? मैं नहीं चाहता कि मेरे विषय में कहे गये शब्द वृथा जाएँ। अत: अच्छा हो, यदि इन्हें किसी दूसरे को अर्पित करें।
 
तात्पर्य
 सूत, मागध तथा वन्दीजनों द्वारा की गई प्रार्थनाएँ तथा प्रशंसाएँ महाराज पृथु के दैवी गुणों को बताने वाली थीं, क्योंकि वे भगवान् के शक्त्यावेश अवतार थे। चूँकि ये गुण अभी प्रकट नहीं हुए थे, अत: राजा पृथु ने भक्तों से नम्रतापूर्वक पूछा कि वे उनकी इतनी अधिक प्रशंसा क्यों कर रहे हैं। वे नहीं चाहते थे कि जब तक ये गुण वास्तव में आ न जाँय, तब तक कोई उनकी प्रशंसा करे। उनकी प्रार्थनाओं का किया जाना उपयुक्त था, क्योंकि वे ईश्वर के अवतार थे, किन्तु उन्होंने आगाह किया कि दैवी गुणों से सम्पन्न हुए बिना किसी को भगवान् का अवतार नहीं मान लेना चाहिए। आजकल भगवान् के तथाकथित अनेक अवतार हैं, किन्तु ये धूर्त तथा निरे मूर्ख हैं, जिन्हें लोग ईश्वर का अवतार मान बैठते हैं यद्यपि ये दैवी गुणों से शून्य हैं। राजा पृथु ने चाहा की कि भावी गुणों से उनके प्रति प्रशंसात्मक शब्दों की पुष्टि हो सके। यद्यपि प्रार्थनाओं में कोई दोष न था, किन्तु पृथु महाराज ने इंगित किया कि ऐसी स्तुतियाँ किसी अयोग्य पुरुष के प्रति न की जाँय जो अपने को भगवान् का अवतार बताता हो।
 
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