श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 16

 
श्लोक
द‍ृढव्रत: सत्यसन्धो ब्रह्मण्यो वृद्धसेवक: ।
शरण्य: सर्वभूतानां मानदो दीनवत्सल: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
दृढ-व्रत:—दृढ़संकल्प वाला; सत्य-सन्ध:—सत्य-प्रतिज्ञ; ब्रह्मण्य:—ब्राह्मण संस्कृति का प्रेमी; वृद्ध-सेवक:—वृद्ध पुरुषों का दास; शरण्य:—शरणागत-वत्सल; सर्व-भूतानाम्—समस्त जीवात्माओं का; मान-द:—सबों का सम्मान करनेवाला; दीन वत्सल:—दीनों तथा अनाथों पर अत्यधिक दयालु ।.
 
अनुवाद
 
 यह राजा दृढ़संकल्प वाला तथा सत्यव्रती होगा। यह ब्राह्मण-संस्कृति का प्रेमी, वृद्धों की सेवा करने वाला तथा शरणागतों को प्रश्रय देने वाला होगा। यह सबों का सम्मान करेगा और दीन-दुखियों तथा अबोधों पर सदैव कृपालु रहेगा।
 
तात्पर्य
 वृद्ध-सेवक: शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वृद्ध पुरुष दो प्रकार के होते हैं—एक तो वे जो आयु से वृद्ध हैं और दूसरे वे जो ज्ञान से वृद्ध हैं। संस्कृत के ये दो शब्द से स्पष्ट है कि मनुष्य ज्ञानोन्नति से भी वृद्ध हो
सकता है। राजा पृथु ब्राह्मणों का आदर करने वाला था और उनकी रक्षा करता था। वह वृद्ध लोगों की भी रक्षा करता था। राजा जो भी करने का निश्चय करता उसे कोई बदल नहीं सकता था। इसीको दृढ़संकल्प या दृढ़व्रत कहा जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥