श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 19

 
श्लोक
अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीश:कूटस्थ आत्मा कलयावतीर्ण: ।
यस्मिन्नविद्यारचितं निरर्थकंपश्यन्ति नानात्वमपि प्रतीतम् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
अयम्—यह राजा; तु—तब; साक्षात्—प्रत्यक्ष; भगवान्—भगवान्; त्रि-अधीश:—तीनों लोकों का स्वामी; कूट-स्थ:—बिना किसी परिवर्तन के; आत्मा—परमात्मा; कलया—आंशिक विस्तार से; अवतीर्ण:—अवतरित; यस्मिन्—जिसमें; अविद्या रचितम्—अज्ञान से उत्पन्न; निरर्थकम्—अर्थरहित; पश्यन्ति—देखते हैं; नानात्वम्—विविधता; अपि—निश्चय ही; प्रतीतम्— मिथ्या, अप्रकट ।.
 
अनुवाद
 
 यह राजा तीनों लोकों का स्वामी है और सीधे भगवान् ने इसे शक्ति प्रदान की है। यह अपरिवर्तनीय है और परमेश्वर का शक्त्यावेश अवतार है। मुक्त आत्मा तथा परम विद्वान् होने के कारण यह समस्त भौतिक विविधताओं को अर्थहीन मानता है, क्योंकि इनका मूलाधार अविद्या है।
 
तात्पर्य
 इन स्तुतियों के गायक पृथु महाराज के दिव्य गुणों का वर्णन कर रहे हैं। इन गुणों का सारांश साक्षाद् भगवान् इन दो शब्दों में निहित है। इससे सूचित होता है कि महाराज पृथु साक्षात् भगवान् हैं, अत: उनमें अनन्त सद्गुण हैं, किन्तु भगवान् के अवतार होने के कारण अन्य कोई इन सर्वोत्तम गुणों में महाराज पृथु की समता नहीं कर सकते। भगवान् छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं और राजा पृथु में भी इतनी शक्ति है कि वे भगवान् के छहों ऐश्वर्यों को पूर्ण रूप से प्रदर्शित कर सकते थे।
कूटस्थ शब्द महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है “बिना परिवर्तन के।” जीवात्माएँ दो प्रकार की हैं— नित्यमुक्त तथा नित्य-बद्ध। नित्यमुक्त कभी नहीं भूलता कि वह भगवान् का नित्य दास है। जो अपने पद को नहीं भूलता और यह जानता रहता है कि वह परमेश्वर का भिन्नांश है, वह नित्यमुक्त है। ऐसा नित्यमुक्त जीवात्मा परमात्मा का अंश-रूप होता है। जैसाकि वेदों में कहा गया है—नित्यो नित्यानाम्। इस प्रकार नित्यमुक्त जीवात्मा जानता है कि वह परम नित्य या नित्य परमेश्वर का विस्तार है। ऐसे पद में स्थित होकर वह भौतिक जगत को भिन्न दृष्टि से देखता है। नित्यबद्ध जीवात्मा भौतिक विविधताओं को वास्तव में एक दूसरे से भिन्न देखता है। इस सम्बन्ध में हमें स्मरण रखना चाहिए कि बद्धजीव का शरीर वस्त्र के समान माना जाता है। मनुष्य चाहे तो विविध वस्त्र धारण कर सकता है, किन्तुजो यथार्थ ज्ञानी है, वह वस्त्रों पर ध्यान नहीं देता। जैसा कि भगवद्गीता (५.१८) में कहा गया है—

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ॥

“यथार्थ ज्ञानी विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते तथा चाण्डाल को समान रूप से देखते हैं।”

इस प्रकार ज्ञानी पुरुष जीवात्मा को बाहर से ढकनेवाले वस्त्रों को न देखकर नाना प्रकार के वस्त्रों के भीतर की शुद्ध आत्मा को देखता है और यह अच्छी तरह जानता है कि नाना प्रकार के वस्त्र अविद्याजन्य हैं (अविद्यारचितम्)। शक्त्यावेश अवतार होने के कारण पृथु महाराज ने अपनी आत्म- स्थिति नहीं बदली, अत: उनके द्वारा भौतिक जगत को सत्य मानने की कोई सम्भावना नहीं थी।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥