श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 20

 
श्लोक
अयं भुवो मण्डलमोदयाद्रे-र्गोप्तैकवीरो नरदेवनाथ: ।
आस्थाय जैत्रं रथमात्तचाप:पर्यस्यते दक्षिणतो यथार्क: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
अयम्—यह राजा; भुव:—जगत का; मण्डलम्—गोलक; आ-उदय-अद्रे:—उदयाचल से, जहाँ सबसे पहले सूर्य दिखता है; गोप्ता—रक्षा करेगा; एक—अद्वितीय; वीर:—शक्तिशाली; नर-देव—समस्त राजाओं का, मानव समाज में देवों का; नाथ:— स्वामी; आस्थाय—स्थित होकर; जैत्रम्—विजयी; रथम्—उसका रथ; आत्त-चाप:—धनुष धारण करते हुए; पर्यस्यते— प्रदक्षिणा करेगा; दक्षिणत:—दक्षिण दिशा से; यथा—जिस प्रकार; अर्क:—सूर्य ।.
 
अनुवाद
 
 यह राजा अद्वितीय शक्तिशाली तथा वीर होगा, जिससे इसका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं होगा। यह अपने हाथ में धनुष धारण करके विजयी रथ पर चढक़र सूर्य के समान दिखाई देता हुआ भूमण्डल की प्रदक्षिणा करेगा, जो दक्षिण से अपनी कक्षा पर परिभ्रमण करता है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक के यथार्क: शब्द से सूचित होता है कि सूर्य स्थिर नहीं है, वरन् अपनी उस कक्षा पर भ्रमण करता है, जिसे भगवान् ने नियत कर रखा है। इसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता तथा श्रीमद्भागवत के अन्य अंशों से भी होती है।भागवत के पंचम स्कंध में कहा गया है कि सूर्य अपनी कक्षा पर सोलह हजार मील प्रति सेकंड की गति से घूम रहा है। इसी प्रकार ब्रह्म-संहिता का कथन है—यस्याज्ञया भ्रमति सम्भृतकालचक्र:—सूर्य अपनी कक्षा में भगवान् के आदेशानुसार घूमता है। निष्कर्ष यह निकला कि सूर्य किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं है। जहाँ तक पृथु महाराज का प्रश्न है, यहाँ यह सूचित होता है उनकी शासन-शक्ति संसार भर में फैलेगी। हिमालय पर्वत को उदयाचल या उदयाद्रि कहा जाता है क्योंकि यहीं सूर्योदय सर्वप्रथम दिखता है। यहाँ यह कहा गया है कि पृथ्वी पर पृथु महाराज का शासन हिमालय पर्वत को भी लाँघ करके समुद्रों तक फैलेगा। दूसरे शब्दों में, उसका राज्य समस्त लोक में होगा।
इस श्लोक का दूसरा महत्त्वपूर्ण शब्द नरदेव है। जैसाकि पिछले श्लोकों में वर्णित है, योग्य राजा, चाहे वह राजा पृथु हो या अन्य कोई, जो राज्य पर आदर्श राजा की भाँति शासन करता है उसे मनुष्य रूप में ईश्वर समझना चाहिए। वैदिक संस्कृति के अनुसार राजा को भगवान् के समान सम्मानित किया जाता है क्योंकि वह नारायण का प्रतिनिधि होता है, जो नागरिकों की रक्षा भी करता है। इसलिए उसे नाथ अर्थात् स्वामी भी कहा जाता है। यहाँ तक कि सनातन गोस्वामी भी नवाब हुसेन शाह को नरदेव के समान सम्मान देते थे यद्यपि नवाब एक मुसलमान था। अत: राजा या राज्य-प्रधान को राज्य पर शासन करने में इतना दक्ष होना चाहिए कि नागरिक उसे मानव रूप में ईश्वर की भाँति पूजें। किसी भी सरकार या राज्य के अध्यक्ष की यही सिद्ध अवस्था है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥