श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 27

 
श्लोक
दिशो विजित्याप्रतिरुद्धचक्र:स्वतेजसोत्पाटितलोकशल्य: ।
सुरासुरेन्द्रैरुपगीयमानमहानुभावो भविता पतिर्भुव: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
दिश:—सभी दिशाएँ; विजित्य—जीतकर; अप्रतिरुद्ध—बिना रोक के; चक्र:—प्रभाव या शक्ति; स्व-तेजसा—अपने तेज से; उत्पाटित—उच्छेदित, निकाला हुआ; लोक-शल्य:—जनता के दुख; सुर—देवताओं का; असुर—असुरों का; इन्द्रै:—प्रमुखों द्वारा; उपगीयमान—प्रशंसित होकर; महा-अनुभाव:—महा-पुरुष; भविता—होगा; पति:—स्वामी; भुव:—जगत का ।.
 
अनुवाद
 
 पृथु महाराज की आज्ञाओं का उल्लंघन कोई नहीं कर सकेगा। सारे जगत को जीतकर वह नागरिकों के तीनों तापों को समूल नष्ट करेगा। तब सारे जगत में उसको मान्यता प्राप्त होगी। तब सुर तथा असुर दोनों उसके उदार कार्यों की निस्सन्देह प्रशंसा करेंगे।
 
तात्पर्य
 राजा पृथु के काल में यद्यपि अनेक अधीनस्थ राज्य थे, किन्तु सारे संसार पर राज्य करनेवाला एक सम्राट होता था। जिस प्रकार संसार के विभिन्न भागों में अनेक संयुक्त राज्य हैं उसी तरह प्राचीन काल में अनेक राज्यों के माध्यम से संसार पर शासन चलाया जाता था, किन्तु एक सर्वोच्च सम्राट होता था, जो समस्त अधीनस्थ राज्यों पर शासन करता था। जैसे ही छोटे-छोटे राज्यों में वर्णाश्रम-पद्धति के पालन में कोई त्रुटि आती, सम्राट उन्हें तुरन्त अपने अधीन कर लेता था।
उत्पाटित लोकशल्य: शब्द यह सूचित करता है कि महाराज पृथु ने अपनी प्रजा के समस्त कष्टों को समूल नष्ट कर दिया था। शल्य का अर्थ है “चुभनेवाले काँटे।” राज्य के नागरिकों को कई प्रकार के काँटे चुभते रहते हैं, किन्तु समस्त चतुर शासक, यहाँ तक कि महाराज युधिष्ठिर के शासन काल तक भी, नागरिकों के कष्टों को दूर करते थे। कहा जाता है कि महाराज युधिष्ठिर के शासन में न तो कठिन शीत पड़ती थी, न झुलसाती गर्मी, न ही नागरिकों को कोई मानसिक चिन्ता थी। अच्छी सरकार का यही आदर्श है। पृथु महाराज ने ऐसी ही शान्त, सम्पन्न तथा चिन्तामुक्त सरकार की स्थापना की थी। इस प्रकार सुर तथा असुर दोनों ही महाराज पृथु के कार्यकलापों का गुणानुवाद करते थे। जो व्यक्ति या राष्ट्र सारे विश्व में अपना प्रभाव जताना चाहते हैं, उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई नागरिकों के तीनों तापों को समूल नष्ट कर सकता है, तो उसे ही संसार पर राज्य करने की आकांक्षा रखनी चाहिए। मनुष्य को किसी राजनीतिक या कूटनीतिक विचार से राज्य करने की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के चर्तुथ स्कन्ध के अन्तर्गत “बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति” नामक सोलहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥