श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 4

 
श्लोक
एष धर्मभृतां श्रेष्ठो लोकं धर्मेऽनुवर्तयन् ।
गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता तत्परिपन्थिनाम् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—यह राजा पृथु; धर्म-भृताम्—धार्मिक कर्म करनेवाले पुरुषों में; श्रेष्ठ:—श्रेष्ठ; लोकम्—सारा संसार; धर्मे—धार्मिक कार्यों के; अनुवर्तयन्—ठीक से लगाये रखते हुए; गोप्ता—रक्षक; च—भी; धर्म-सेतूनाम्—धर्म के नियमों का; शास्ता—दण्ड देनेवाला; तत्-परिपन्थिनाम्—उनके विरोधियों को ।.
 
अनुवाद
 
 यह राजा, महाराज पृथु, धार्मिक नियमों के पालन करनेवालों में सर्वश्रेष्ठ है। अत: वह प्रत्येक व्यक्ति को धर्म में प्रवृत्त करेगा और धर्म के उन सिद्धान्तों की रक्षा करेगा। अधर्मियों तथा नास्तिकों के लिए वह महान् दण्ड-दाता भी होगा।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में राजा अथवा सरकार के प्रधान के कर्तव्य का सुन्दर वर्णन हुआ है। सरकार के प्रधान का कर्तव्य है कि वह यह देखे कि सभी लोग दृढ़तापूर्वक धार्मिक जीवन का पालन कर रहे हैं। राजा को नास्तिकों को दण्डित करने में भी कठोर होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, राजा या सरकार के प्रधान को चाहिए कि नास्तिक या ईश्वरविहीन सरकार को प्रश्रय न दे। अच्छी सरकार की यही कसौटी है। धर्मनिरपेक्ष सरकार के नाम पर राजा या सरकार का प्रधान उदासीन रहता है और लोगों को सभी प्रकार के अधार्मिक कृत्य करने की छूट देता है। ऐसे राज्य में समस्त आर्थिक विकास
के बावजूद लोग सुखी नहीं रह सकते। किन्तु इस कलियुग में एक भी पवित्र राजा नहीं है, अपितु चोर-उचक्कों को सरकार का प्रधान चुना जाता है। भला धर्म और ईशचेतना के बिना लोग कैसे सुखी रह सकते हैं? ये धूर्त अपनी इन्द्रिय-तुष्टि के लिए नागरिकों से मनमाना कर खसोटते हैं। भविष्य में लोग इतने तंग हो उठेंगे कि श्रीमद्भागवत के अनुसार वे अपने-अपने घर तथा गाँव छोडक़र जंगलों में जा बसेंगे। फिर भी कलियुग में कृष्णभावनाभावित लोगों के द्वारा प्रजातांत्रिक सरकार को कब्जे में किया जा सकता है। यदि ऐसा हो जाये तो जनता अत्यन्त सुखी हो जाये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥