श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 16: बन्दीजनों द्वारा राजा पृथु की स्तुति  »  श्लोक 7

 
श्लोक
तितिक्षत्यक्रमं वैन्य उपर्याक्रमतामपि ।
भूतानां करुण: शश्वदार्तानां क्षितिवृत्तिमान् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
तितिक्षति—सहन करता है; अक्रमम्—अपराध; वैन्य:—राजा वेन का पुत्र; उपरि—सिर के ऊपर; आक्रमताम्—पद रखनेवालों को; अपि—भी; भूतानाम्—समस्त जीवात्मा के; करुण:—अत्यन्त दयालु; शश्वत्—सदैव; आर्तानाम्—दुखियों का; क्षिति वृत्ति-मान्—पृथ्वी की वृत्ति ग्रहण करनेवाले ।.
 
अनुवाद
 
 यह राजा पृथु समस्त नागरिकों पर अत्यधिक दयालु रहेगा। यदि एक दीन पुरुष विधि विधानों की अवहेलना करके राजा के सिर पर अपना पाँव रख दे, तो भी राजा अपनी अहैतुकी कृपा से उस पर ध्यान न देकर क्षमा कर देगा। जगत के रक्षक के रूप में यह पृथ्वी की ही भाँति सहिष्णु होगा।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर राजा पृथु की सहनशीलता की तुलना पृथ्वी से की गई है। यद्यपि पृथ्वी सदैव मनुष्यों तथा पशुओं द्वारा पद-दलित होती रहती है, तो भी वह अन्न, फल, शाक इत्यादि उत्पन्न करके उन्हें भोजन देती है। आदर्श राजा के रूप में महाराज पृथु की तुलना पृथ्वी से की गई है, क्योंकि भले ही कुछ नागरिक राज्य के विधि-विधानों का उल्लंघन करें तो भी वह सहिष्णु बनकर अन्न तथा फल से उनका पालन करेगा। दूसरे शब्दों में, अपनी सुविधाओं की परवाह न करते हुए नागरिकों की सुविधाओं का ध्यान रखना
राजा का कर्तव्य है। किन्तु कलियुग में ऐसा नहीं होता है। कलियुग में तो राजा तथा राज्य के प्रधान राज्य के नागरिकों से कर संग्रह करके उसका व्यय अपने सुखोपभोग में करते हैं। ऐसे अन्यायपूर्ण कर-संग्रह से लोग बेईमान हो जाते हैं और अपनी आय को तरह-तरह से छिपाने लगते हैं। अन्तत: राज्य उनसे कर संग्रह नहीं कर सकेगा और प्रभूत सैनिक तथा प्रशासनिक खर्चों की पूर्ति नहीं हो सकेगी। सारी व्यवस्था बैठ जायेगी और राज्यभर में उपद्रव तथा अशान्ति उत्पन्न हो जायेगी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥