श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 10-11

 
श्लोक
वयं राजञ्जाठरेणाभितप्तायथाग्निना कोटरस्थेन वृक्षा: ।
त्वामद्य याता: शरणं शरण्यंय: साधितो वृत्तिकर: पतिर्न: ॥ १० ॥
तन्नो भवानीहतु रातवेऽन्नंक्षुधार्दितानां नरदेवदेव ।
यावन्न नङ्‍क्ष्यामह उज्झितोर्जावार्तापतिस्त्वं किल लोकपाल: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
वयम्—हम; राजन्—हे राजा; जाठरेण—भूख की ज्वाला से; अभितप्ता:—अत्यन्त त्रस्त; यथा—जिस प्रकार; अग्निना—आग से; कोटर-स्थेन—पेड़ के कोटर में; वृक्षा:—वृक्ष; त्वाम्—तुम तक; अद्य—आज; याता:—हम आये हैं; शरणम्—शरण; शरण्यम्—शरण लेने के योग्य; य:—जो; साधित:—नियुक्त; वृत्ति-कर:—रोजगार देने वाला; पति:—स्वामी; न:—हमारे; तत्—अत:; न:—हमको; भवान्—आप; ईहतु—प्रयत्न करो; रातवे—देने के लिए; अन्नम्—अनाज; क्षुधा—भूख से; अर्दितानाम्—कष्ट भोगते हुए; नर-देव-देव—हे समस्त राजाओं के परम स्वामी; यावत् न—जब तक नहीं; नङ्क्ष्यामहे—हम मर जाएंगे; उज्झित—विहीन; ऊर्जा:—अन्न; वार्ता—व्यवसाय का; पति:—देनेवाला; त्वम्—तुम; किल—निस्सन्देह; लोक- पाल:—जनता के रक्षक ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, जिस प्रकार वृक्ष के कोटर में लगी आग वृक्ष को धीरे-धीरे सुखा देती है, उसी प्रकार हम जठराग्नि (भूख) से सूख रहे हैं। आप शरणागत जीवों के रक्षक हैं और आप हमें वृत्ति (जीविका) देने के लिए नियुक्त हुए हैं। अत: हम सभी आपके संरक्षण में आये हैं। आप केवल राजा ही नहीं हैं, आप भगवान् के अवतार भी हैं। वास्तविक रूप में आप राजाओं के राजा हैं। आप हमें सभी प्रकार की जीविकाएँ प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि आप हमारी जीविका के स्वामी हैं। अत: हे राजराजेश्वर, उचित अन्न वितरण के द्वारा हमारी भूख को शान्त करने की व्यवस्था कीजिये। आप हमारी रक्षा करें जिससे हम अन्न के अभाव से मरें नहीं।
 
तात्पर्य
 यह देखना राजा का कर्तव्य है कि सामाजिक व्यवस्था में राज्य के हर एक व्यक्ति— ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—पूरी तरह से काम में लगे हुए हैं। जिस प्रकार ब्राह्मणों का यह कर्तव्य है कि वे राजा चुनें, उसी प्रकार राजा का कर्तव्य है कि वह देखे कि चारों वर्ण के लोग अपने-अपने व्यवसाय में रत हैं। यहाँ पर यह इंगित किया गया है कि यद्यपि
लोगों को अपना कर्तव्य निभाने की अनुमति थी, किन्तु तो भी बेरोजगारी थी। यथापि वे लोग आलसी न थे तो भी वे अपनी भूख बुझाने के लिए पर्याप्त अन्नोत्पादन नहीं कर पा रहे थे। जब लोग इस प्रकार व्यथित हों तो उन्हें चाहिए कि शासनाध्यक्ष के पास पहुँचें और राजा या अध्यक्ष को चाहिए कि लोगों के दुख का शमन करने के लिए तत्काल उपाय करे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥