श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 20

 
श्लोक
प्रहरन्ति न वै स्त्रीषु कृताग:स्वपि जन्तव: ।
किमुत त्वद्विधा राजन् करुणा दीनवत्सला: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
प्रहरन्ति—मारते हैं; न—नहीं; वै—निश्चय ही; स्त्रीषु—स्त्रियों को; कृत-आग:सु—पापकर्म करने पर; अपि—यद्यपि; जन्तव:—मानव प्राणी; किम् उत—फिर क्या कहा जाये; त्वत्-विधा:—तुम्हारे समान महापुरुष; राजन्—हे राजा; करुणा:— दयालु; दीन-वत्सला:—दीनों के प्रति स्नेहिल ।.
 
अनुवाद
 
 यदि स्त्री कोई पापकर्म भी करे तो मनुष्य को उस पर हाथ नहीं उठाना चाहिए। हे राजन्, आप तो इतने दयालु हैं कि आपके विषय में क्या कहा जाये? आप रक्षक हैं और दीनवत्सल हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥