श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 23

 
श्लोक
यवसं जग्ध्यनुदिनं नैव दोग्ध्यौधसं पय: ।
तस्यामेवं हि दुष्टायां दण्डो नात्र न शस्यते ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
यवसम्—हरी घास; जग्धि—चरती हो; अनुदिनम्—प्रतिदिन; न—कभी नहीं; एव—निश्चय ही; दोग्धि—देती हो; औधसम्— थन में; पय:—दूध; तस्याम्—जब एक गाय; एवम्—इस प्रकार; हि—निश्चय ही; दुष्टायाम्—अपराधी होकर; दण्ड:—दण्ड, सजा; न—नहीं; अत्र—यहाँ; न—नहीं; शस्यते—उचित ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि तुम नित्य ही हरी घास चरती हो, किन्तु तुम हमारे उपयोग के लिए अपने थन को दूध से भरती नहीं हो। चूँकि तुम जान-बूझ कर अपराध कर रही हो, अत: तुम्हारे द्वारा गाय का रूप धारण करने के कारण तुम्हें दण्ड देना अनुचित नहीं कहा जा सकता।
 
तात्पर्य
 गाय चरागाह की हरी-हरी घास चरती है और अपने थन को पर्याप्त मात्रा में दूध से भरती है, जिसे ग्वाले दोह सकें । यज्ञ इसलिए किये जाते हैं कि प्रचुर बादल बनें और पृथ्वी पर वर्षा करें। पय: शब्द से दूध तथा जल दोनों ही अर्थ ग्रहण होते हैं। देवता के रूप में
पृथ्वी अपना यज्ञ-भाग तो ग्रहण करती थी—अर्थात् हरी-हरी घास चरती थी—किन्तु बदले में वह प्रचुर अन्न नहीं उत्पन्न कर रही थी, अर्थात् वह अपने थन को दूध से पूरित नहीं कर रही थी। अत: पृथु महाराज उसके अपराध के लिए उसे दण्ड देने की धमकी ठीक ही थी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥