श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 17: महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
यदाभिषिक्त: पृथुरङ्ग विप्रै-रामन्त्रितो जनतायाश्च पाल: ।
प्रजा निरन्ने क्षितिपृष्ठ एत्यक्षुत्क्षामदेहा: पतिमभ्यवोचन् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ऋषि ने कहा; यदा—जब; अभिषिक्त:—गद्दी पर बिठा दिये गये; पृथु:—राजा पृथु; अङ्ग—हे विदुर; विप्रै:—ब्राह्मणों के द्वारा; आमन्त्रित:—घोषित; जनताया:—प्रजा का; च—भी; पाल:—रक्षक; प्रजा:—नागरिक; निरन्ने— बिना अन्न के; क्षिति-पृष्ठे—पृथ्वी की सतह पर; एत्य—पास आकर; क्षुत्—भूख से; क्षाम—दुर्बल; देहा:—उनके शरीर; पतिम्—रक्षक से; अभ्यवोचन्—कहा ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, जब ब्राह्मणों तथा ऋषियों ने राजा पृथु को राजसिंहासन पर बिठाया दिया तथा उन्हें नागरिकों का रक्षक घोषित किया तो उस समय अन्न का अभाव था। नागरिक भूख के मारे सूख कर काँटा हो गये थे, अत: वे राजा के समक्ष आये और उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति कह सुनाई।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ब्राह्मणों द्वारा राजा के चुनाव के सम्बन्ध में जानकारी दी गई है। वर्णाश्रम- पद्धति के अनुसार ब्राह्मणों को समाज का प्रधान माना जाता है और इसलिए उन्हें सर्वोच्च सामाजिक स्थान प्राप्त है। वर्णाश्रम धर्म अत्यन्त वैज्ञानिक ढंग से बनाया गया है, जिसमें चार वर्ण तथा चार आश्रम हैं। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, वर्णाश्रम धर्म मानव-कृत नहीं है, वरन् यह ईश्वर-कृत संस्था है। इस कथानक से यह स्पष्ट सूचित होता है कि राज-सत्ता को ब्राह्मण ही नियंत्रित करते थे। जब वेन जैसा दुष्ट राजा राज्य करता तो ब्राह्मण उसे अपनी शक्ति से मार डालते और योग्यता की परीक्षा करके दूसरा राजा चुनते थे। दूसरे शब्दों में, ब्राह्मण, बुद्धिमानजन या ऋषि राज्य-सत्ता पर नियंत्रण रखते थे। यहाँ पर हमें संकेत मिलता है कि ब्राह्मणों ने किस प्रकार राजा पृथु को प्रजा के रक्षक के रूप में सिंहासन पर बिठाया। प्रजा भूख के मारे दुर्बल हो जाने के कारण राजा के पास आई और उन्होंने सूचित किया कि उचित कार्यवाही की जाये। वर्णाश्रम धर्म की संरचना इतनी उत्तम थी कि ब्राह्मण राज्य के अध्यक्ष का पथ-प्रदर्शन करते थे। तब राज्याध्यक्ष प्रजा की रक्षा करता था। क्षत्रिय जनता की रक्षा का भार सँभालते थे और क्षत्रियों के संरक्षण में वैश्य गायों की रक्षा करते, अन्न उत्पन्न करते और उसका वितरण करते थे। शूद्र अर्थात् कामकाज करनेवाला वर्ग तीनों उच्च जातियों की सहायता शारीरिक श्रम द्वारा करता था। यह अत्यन्त सुचारु सामाजिक पद्धति है।
 
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