श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 18: पृथु महाराज द्वारा पृथ्वी का दोहन  »  श्लोक 29

 
श्लोक
चूर्णयन् स्वधनुष्कोट्या गिरिकूटानि राजराट् ।
भूमण्डलमिदं वैन्य: प्रायश्चक्रे समं विभु: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
चूर्णयन्—खण्ड-खण्ड करते हुए; स्व—अपने; धनु:-कोट्या—धनुष के बल से; गिरि—पर्वतों के; कूटानि—शिखरों को; राज-राट्—सम्राट; भू-मण्डलम्—समस्त पृथ्वी; इदम्—यह; वैन्य:—वेन के पुत्र ने; प्राय:—प्राय:; चक्रे—कर दिया; समम्—समतल; विभु:—शक्तिमान ।.
 
अनुवाद
 
 फिर राजधिराज महाराज पृथु ने अपने बाण की शक्ति से पर्वतों को तोड़ कर भूमण्डल के समस्त ऊबड़-खाबड़ स्थानों को समतल कर दिया। उनकी कृपा से भूमण्डल की पूरी सतह प्राय: सपाट हो गई।
 
तात्पर्य
 सामान्यत: पृथ्वी के पर्वतीय भाग वज्रपात से सपाट होते रहते हैं। सामान्यत: यह स्वर्ग के राजा इन्द्र का कार्य है, किन्तु भगवान् के
अवतार राजा पृथु ने इसके लिए इन्द्र की प्रतीक्षा नहीं की, वरन् अपने बलशाली बाण के द्वारा पर्वतों को स्वयं खण्ड-खण्ड कर दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥