श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 18: पृथु महाराज द्वारा पृथ्वी का दोहन  »  श्लोक 32

 
श्लोक
प्राक्पृथोरिह नैवैषा पुरग्रामादिकल्पना ।
यथासुखं वसन्ति स्म तत्र तत्राकुतोभया: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
प्राक्—पूर्व; पृथो:—राजा पृथु के; इह—इस पृथ्वी पर; न—कभी नहीं; एव—निश्चय ही; एषा—यह; पुर—नगरों की; ग्राम- आदि—गाँवों आदि की.; कल्पना—नियोजित व्यवस्था; यथा—जिस प्रकार; सुखम्—सुविधाजनक; वसन्ति स्म—रहते थे; तत्र तत्र—जहाँ तहाँ; अकुत:-भया:—बिना हिचक के, बेखटके ।.
 
अनुवाद
 
 राजा पृथु के शासन के पूर्व विभिन्न नगरों, ग्रामों, गोचरों इत्यादि की सुनियोजित व्यवस्था न थी। सब कुछ तितर-बितर था और हर व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार अपना वास-स्थान बनाता था। किन्तु राजा पृथु के काल से नगरों तथा ग्रामों की योजनाएँ बनने लगीं।
 
तात्पर्य
 इस कथन से लगता है कि नगर-योजना नवीन नहीं है, वरन् राजा पृथु के काल से चली आ रही है। हम भारत के अत्यन्त प्राचीन नगरों में सुव्यवस्थित योजना विधियाँ पाते हैं। श्रीमद्भागवत में ऐसे प्राचीन नगरों के अनेक वर्णन आये हैं। यहाँ तक कि पाँच हजार
वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण की राजधानी द्वारका सुनियोजित नगरी थी तथा इसी प्रकार मथुरा तथा हस्तिनापुर (अब नई दिल्ली) जैसे अनेक सुनियोजित नगर थे। इस प्रकार नगरों की योजना कोई नवीन कल्पना नहीं है, वरन् वह प्राचीन युग में विद्यमान थी।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध के अन्तर्गत “पृथु महाराज द्वारा पृथ्वी का दोहन” नामक अठारहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥