श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 18: पृथु महाराज द्वारा पृथ्वी का दोहन  »  श्लोक 5

 
श्लोक
ताननाद‍ृत्य योऽविद्वानर्थानारभते स्वयम् ।
तस्य व्यभिचरन्त्यर्था आरब्धाश्च पुन: पुन: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तान्—उनकी; अनादृत्य—उपेक्षा करके; य:—जो कोई; अविद्वान्—धूर्त; अर्थान्—योजनाएँ; आरभते—प्रारम्भ करता है; स्वयम्—स्वयं; तस्य—उसके; व्यभिचरन्ति—सफल नहीं होते; अर्था:—कार्य; आरब्धा:—प्रयत्न किये गये; च—तथा; पुन: पुन:—बार-बार ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा मूर्ख पुरुष जो कोई मनोकल्पना द्वारा अपने निजी साधन तथा माध्यम तैयार करता है और साधुओं द्वारा स्थापित दोषहीन आदेशों को मान्यता नहीं प्रदान करता, वह अपने प्रयासों में बार-बार असफल होता है।
 
तात्पर्य
 आजकल प्राचीन आचार्यों तथा मुक्त पुरुषों द्वारा दिये गये निर्दोष आदेशों का उल्लंघन करना एक फैशन बन चुका है। आजकल के लोग इतने पतित हो चुके हैं कि उन्हें मुक्तजीव या बद्धजीव में अन्तर प्रतीत नहीं होता। बद्धजीव में चार दोष होते हैं—वह त्रुटि करेगा, वह मोहग्रस्त होगा, वह दूसरों को धोखा दे सकता है तथा उसकी इन्द्रियाँ अपूर्ण होती हैं। अत: हमें मुक्त पुरुषों से आदेश ग्रहण करना होगा। कृष्णभावनामृत आन्दोलन सीधे भगवान् से उन व्यक्तियों के माध्यम से आदेश प्राप्त करता है, जो इन आदेशों का दृढ़ता से पालन करते रहते हैं। कोई अनुयायी भले ही मुक्त पुरुष न हो, किन्तु यदि वह
मुक्त रूप भगवान् का अनुसरण करता है, तो स्वाभाविक रूप से उसके कर्म भौतिक प्रकृति के कल्मषों से मुक्त होते हैं। अत: भगवान् चैतन्य कहते हैं, “मेरे आदेश से तुम गुरु बन सकते हो।” भगवान् के दिव्य आदेशों में पूर्ण श्रद्धा रखकर तथा इन आदेशों का पालन करके मनुष्य तुरन्त गुरु बन सकता है। भौतिकतावादी लोग मुक्त पुरुष से आदेश ग्रहण करने में रुचि नहीं रखते, वे तो अपने ही कल्पित विचारों में रुचि रखते हैं, जिसके कारण उन्हें अपने प्रयासों में बार-बार असफल होना पड़ता है। चूँकि अब सारा संसार बद्धजीवों के अपूर्ण आदेशों का अनुसरण कर रहा है, इसलिए मानवता पूर्णत: मोहग्रस्त है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥