श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 18: पृथु महाराज द्वारा पृथ्वी का दोहन  »  श्लोक 6

 
श्लोक
पुरा सृष्टा ह्योषधयो ब्रह्मणा या विशाम्पते ।
भुज्यमाना मया द‍ृष्टा असद्‌भिरधृतव्रतै: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
पुरा—प्राचीनकाल में; सृष्टा:—उत्पन्न; हि—निश्चय ही; ओषधय:—जड़ी-बूटियाँ तथा अन्न; ब्रह्मणा—ब्रह्मा द्वारा; या:—वे जो; विशाम्-पते—हे राजा; भुज्यमाना:—भोग किया गया; मया—मेरे द्वारा; दृष्टा:—देखा गया; असद्भि:—अभक्तों द्वारा; अधृत व्रतै:—समस्त आध्यात्मिक कृत्यों से शून्य ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, प्राचीनकाल में ब्रह्मा ने जिन बीजों, मूलों, जड़ी-बूटियों तथा अन्नों की सृष्टि की थी वे अब उन अभक्तों द्वारा उपभोग किये जा रहे हैं, जो समस्त आत्म-ज्ञान से शून्य हैं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा ने इस भौतिक जगत की सृष्टि जीवात्माओं के उपयोग के लिए तो की थी, किन्तु सृष्टि इस व्यवस्था के अनुसार हुई थी कि वे समस्त जीवात्माएँ जो इसमें इन्द्रियतृप्ति के लिए आएँगी उन्हें ब्रह्माजी वेदों की शिक्षा देंगे, जिससे वे भगवान् इस संसार को छोडक़र के धाम को वापस जा सकें। पृथ्वी पर उगनेवाली सभी आवश्यक वस्तुएँ यथा फल, फूल, वृक्ष, अन्न, पशु इत्यादि भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ में प्रयुक्त किये जाने के निमित्त उत्पन्न की गई थीं। किन्तु गोरूप पृथ्वी निवेदन कर रही है कि ये समस्त सुविधाएँ ऐसे अभक्तों द्वारा उपयोग में लाई जा रही हैं, जिनके पास आत्मज्ञान के लिए कोई योजना नहीं है। यद्यपि पृथ्वी में अन्न, फल तथा फूल उत्पन्न करने की अपार क्षमता है, किन्तु जब अभक्तों द्वारा जिनका के कोई आध्यात्मिक उद्देश्य नहीं है। इनका उपभोग होने लगता है, तो पृथ्वी स्वयं इन सबका उत्पादन रोक देती है। हर वस्तु भगवान् की है, अत: उनको प्रसन्न करने के लिए हर वस्तु का उपयोग हो सकता है। वस्तुओं का उपभोग जीवात्माओं की इन्द्रिय तुष्टि हेतु नहीं होना चाहिए। इस भौतिक प्रकृति के आदेशानुसार यही प्रकृति की पूरी व्यवस्था है। इस श्लोक में दो शब्द महत्त्वपूर्ण हैं—असद्भि: तथा अधृतव्रतै: असद्भि: का तात्पर्य अभक्त है। भगवद्गीता में अभक्तों को दुष्कृतिन: (दुष्ट); मूढा: (गधे या धूर्त); नराधमा: (मनुष्यों में सबसे पतित) तथा माययापहृत-ज्ञाना: (वे जिन्होंने माया शक्ति के कारण ज्ञान
खो दिया है) कहा गया है। ये सभी असत् अर्थात् अभक्त लोग हैं। अभक्तों को गृह-व्रत भी कहा गया है, जबकि भक्त धृतव्रत कहलाते हैं। समस्त वैदिक व्यवस्था यही है कि दिग्भ्रमित बद्धजीवों को, जो भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने आये हैं, धृत-व्रत बनने की शिक्षा दी जाये। इसका अर्थ यह हुआ उन्हें इसका व्रत लेना चाहिए कि वे परमेश्वर की इन्द्रियों को तुष्ट करके ही अपनी इन्द्रियों की तुष्टि करेंगे या भौतिक जीवन का सुख भोगेंगे। परमेश्वर श्रीकृष्ण की इन्द्रियतुष्टि के लिए किये गये कार्यकलाप कृष्णार्थेऽखिलचेष्टा: कहलाते हैं। इससे यह सूचित होता है कि मनुष्य सभी प्रकार के कार्य कर सकता है, किन्तु ये सब कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किये जाने चाहिए। भगवद्गीता में इसे यज्ञार्थात् कर्म कहा गया है। यज्ञ शब्द का अर्थ भगवान् विष्णु है। हमें केवल उन्हीं को प्रसन्न करने के लिये कार्य करना है। किन्तु आधुनिक युग (कलियुग) में लोगों ने विष्णु को एकदम भुला दिया है और वे इन्द्रियतुष्टि के लिए कार्य करते हैं। ऐसे लोग क्रमश: निर्धन होते जाएँगे, क्योंकि वे उन वस्तुओं को अपनी इन्द्रिय तुष्टि के लिए प्रयोग न कर सकेंगे जो परमेश्वर के द्वारा उपभोग्य हैं। यदि वे ऐसा ही करते रहे तो अन्तत: निर्धनता आ जाएगी और अन्न, फल या फूल नहीं उत्पन्न होंगे। भागवत् के बारहवें स्कंध में बताया गया है कि कलियुग के अन्त में लोग इतने दूषित हो चुकेंगे कि अन्न, गेहूँ, गन्ना या दूध कुछ भी उत्पन्न नहीं होगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥