श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 18: पृथु महाराज द्वारा पृथ्वी का दोहन  »  श्लोक 7

 
श्लोक
अपालितानाद‍ृता च भवद्‌भिर्लोकपालकै: ।
चोरीभूतेऽथ लोकेऽहं यज्ञार्थेऽग्रसमोषधी: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
अपालिता—किसी रक्षा के बिना; अनादृता—उपेक्षित; च—भी; भवद्भि:—आपके समान; लोक-पालकै:—अध्यक्षों या राजाओं द्वारा; चोरी-भूते—चोरों से आक्रान्त होकर; अथ—अत:; लोके—इस संसार में; अहम्—मैंने; यज्ञ-अर्थे—यज्ञ सम्पन्न करने के हेतु; अग्रसम्—छिपा ली हैं; ओषधी:—सभी जड़ी-बूटियाँ तथा अनाज ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, अभक्तों द्वारा अन्न तथा जड़ी-बूटियों का उपयोग तो किया ही जा रहा है, मेरी भी ठीक से देखभाल नहीं की जा रही। मेरी उन राजाओं द्वारा उपेक्षा हो रही है, जो उन चोरों को दण्ड नहीं दे रहे जो अन्न का उपयोग इन्द्रियतुष्टि के लिए कर रहे हैं। फलस्वरूप मैंने उन समस्त बीजों को छिपा लिया है, जो यज्ञ सम्पन्न करने के निमित्त हैं।
 
तात्पर्य
 जो कुछ पृथु महाराज तथा उनके पिता राजा वेन के काल में घटित हुआ था, वह आज भी हो रहा है। बड़े पैमाने पर औद्योगिक तथा कृषि उत्पादों के उत्पादन हेतु वृहद् आयोजन सामने आते हैं, किन्तु ये सारे उत्पादन इन्द्रिय-तुष्टि के निमित्त हैं। अत: उत्पादन क्षमता होते हुए भी अभाव छाया रहता है, क्योंकि संसार चोरों से भरा पड़ा है। चोरीभूते शब्द इस बात का सूचक है कि जनता चौर वृत्ति पर उतर आई है। वैदिक ज्ञान के अनुसार मनुष्य तभी चोर बनते हैं जब वे इन्द्रियतृप्ति हेतु आर्थिक विकास की योजनाएँ बनाते हैं। भगवद्गीता में भी बताया गया है कि यदि कोई यज्ञ किये बिना अर्थात् भगवान् को अर्पित किये बिना अन्न खाता है, तो वह चोर है और दण्डनीय है।
आध्यात्मिक साम्यवाद के अनुसार इस भूमण्डल की सारी सम्पति भगवान् की है। जनता का अधिकार है कि भगवान् को भेंट अर्पित करने के बाद ही वस्तुओं का प्रयोग करे। प्रसाद ग्रहण करने की यही विधि है। जब तक कोई इस विधि से प्रसाद ग्रहण नहीं करता, वह निश्चित रूप से चोर है। यह राजाओं तथा लोकपालों का कर्तव्य है कि ऐसे चोरों को दण्ड दें और विश्व का उत्तम रीति से पालन करे। यदि ऐसा नहीं होता तो अन्न नहीं उत्पन्न होगा और लोग भूखों मरेंगे। इससे लोगों को कम भोजन तो मिलेगा ही, वे एक दूसरे को मार कर खाएँगे। वे पहले से ही मांस के लिए पशुओं का वध कर रहे हैं, अत: जब अन्न, शाक तथा फल नहीं होंगे तो वे अपने बाप-बेटों को मार कर अपना उदर-पोषण करेंगे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥