श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 1

 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन स: ।
ब्रह्मावर्ते मनो: क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; अथ—तत्पश्चात्; अदीक्षत—शुरू किया; राजा—राजा ने; तु—तब; हय—घोड़ा, अश्व; मेध— यज्ञ; शतेन—एक सौ सम्पन्न करने के लिए; स:—वह; ब्रह्मावर्ते—ब्रह्मावर्त नाम से विख्यात; मनो:—स्वायंभुव मनु के; क्षेत्रे— भूभाग में; यत्र—जहाँ; प्राची—पूर्व की ओर; सरस्वती—सरस्वती नदी ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, राजा पृथु ने उस स्थान पर जहाँ सरस्वती नदी पूर्वमुखी होकर बहती है, एक सौ अश्वमेध यज्ञ आरम्भ किए। यह भूखण्ड ब्रह्मावर्त कहलाता है, जो स्वायंभुव मनु द्वारा शासित था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥