श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 13

 
श्लोक
अत्रिणा चोदितो हन्तुं पृथुपुत्रो महारथ: ।
अन्वधावत सङ्‍कुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
अत्रिणा—अत्रि मुनि के द्वारा; चोदित:—कहने से, प्रेरणा से; हन्तुम्—मारने के लिए; पृथु-पुत्र:—राजा पृथु के पुत्र ने; महा रथ:—परमवीर; अन्वधावत—पीछा किया; सङ्क्रुद्ध:—अत्यन्त क्रुद्ध; तिष्ठ तिष्ठ—ठहरो ठहरो; इति—इस प्रकार; च—भी; अब्रवीत्—कहा ।.
 
अनुवाद
 
 जब अत्रि मुनि ने राजा पृथु के पुत्र को राजा इन्द्र की चाल बतायी तो वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और “ठहरो! ठहरो!!” कहते हुए इन्द्र को मारने के लिए उसका पीछा करने लगा।
 
तात्पर्य
 जब कोई क्षत्रिय अपने शत्रु को ललकारता है, तो तिष्ठ तिष्ठ शब्दों का प्रयोग करता हैं। लड़ता हुए क्षत्रिय युद्धभूमि से भाग नहीं सकता। किन्तु जब कायरतावश कोई क्षत्रिय युद्धभूमि से शत्रु को अपनी पीठ दिखाता भागता है, तो उसे तिष्ठ तिष्ठ शब्दों से ललकारा जाता है। सच्चा क्षत्रिय अपने शत्रु को कभी न तो पीछे से मारता है और न कभी युद्ध
में पीठ दिखाता है। क्षत्रिय नियम तथा अनुभाव के अनुसार वह या तो विजयी होता है या युद्धभूमि में मरता है। स्वर्ग का राजा होने से यद्यपि राजा इन्द्र अत्यन्त सम्मानित था, किन्तु यज्ञ का घोड़ा चुराने से वह पतित हो गया था। अत: क्षत्रिय नियमों की अवहेलना करके वह भागा जा रहा था। राजा पृथु के पुत्र ने तिष्ठ तिष्ठ शब्दों से उसे ललकारा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥