श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 2

 
श्लोक
तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मन: ।
शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
तत् अभिप्रेत्य—यह विचार कर; भगवान्—परमशक्तिशाली; कर्म-अतिशयम्—सकाम कर्मों में बाजी मारनेवाला; आत्मन:— स्व; शत-क्रतु:—इन्द्र, जिसने एक सौ यज्ञ किये थे; न—नहीं; ममृषे—सहन कर सका; पृथो:—राजा पृथु का; यज्ञ—यज्ञ का; महा-उत्सवम्—महोत्सव ।.
 
अनुवाद
 
 जब स्वर्ग के राजा सर्वाधिक शक्तिशाली इन्द्र ने यह देखा तो उसने विचार किया कि सकाम कर्मों में राजा पृथु उससे बाजी मारने जा रहा है। अत: वह राजा पृथु द्वारा किये जा रहे यज्ञ- महोत्सव को सहन न कर सका।
 
तात्पर्य
 इस भौतिक जगत में जो भी सुखोपभोग करने या भौतिक प्रकृति पर शासन करने के लिए आता है, वह दूसरों से ईर्ष्या करता है। यह ईर्ष्या स्वर्ग के राजा इन्द्र में भी पाई जाती है। जैसाकि शास्त्रों से प्रकट है, इन्द्र अनेक बार अनेक पुरुषों के प्रति ईर्ष्यालु रहा था। वह विशेष रूप से महान् सकाम कर्मों तथा योग अभ्यास अथवा सिद्धियों के प्रति ईर्ष्या रखता था। सहन न कर सकने के कारण वह उन्हें छिन्न-भिन्न करना चाहता था। उसे यह भय बना रहता था कि कहीं कोई योगशक्ति के लिए अधिक बड़े यज्ञ सम्पन्न करके उसका पद न हथिया ले। चूँकि इस भौतिक संसार में कोई भी पराई विभूति नहीं देख सकता,
अत: प्रत्येक व्यक्ति मत्सर, अर्थात् ईष्यालु कहलाता है। इसीलिए श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में कहा गया है कि भागवत निर्मत्सरों के लिए है। दूसरे शब्दों में, जो ईर्ष्या के कल्मष से मुक्त नहीं है, वह कृष्णचेतना में अग्रसर नहीं हो सकता। किन्तु कृष्णचेतना में यदि कोई किसी से आगे निकल जाता है, तो भक्त सोचता है कि वह व्यक्ति कितना भाग्यवान है, जो भक्तिभाव में आगे बढ़ गया है। इस प्रकार का निर्मत्सर वैकुण्ठ की विशेषता है। फिर भी, जब कोई अपने प्रतियोगी से ईर्ष्या करता है, तो वह भौतिक प्राणी होता है। इस भौतिक जगत में पदापित देवता तक ईर्ष्या से मुक्त नहीं हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥