श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 21

 
श्लोक
अत्रिणा चोदितस्तस्मै सन्दधे विशिखं रुषा ।
सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हित: स्वराट् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
अत्रिणा—अत्रि मुनि द्वारा; चोदित:—प्रेरित; तस्मै—इन्द्र के लिए; सन्दधे—स्थापित किया; विशिखम्—अपना तीर; रुषा— क्रोध से; स:—राजा इन्द्र; अश्वम्—घोड़े को; रूपम्—संन्यासी वेश को; च—भी; तत्—उस; हित्वा—त्याग कर; तस्थौ—वहाँ रहता रहा; अन्तर्हित:—अदृश्य; स्व-राट्—स्वाधीन इन्द्र ।.
 
अनुवाद
 
 जब अत्रि मुनि ने पुन: आदेश दिया तो राजा पृथु का पुत्र अत्यन्त कुपित हुआ और उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ा लिया। यह देख कर राजा इन्द्र ने तुरन्त संन्यासी का वह कपट वेष त्याग दिया और घोड़े को छोड़ कर वह स्वयं अदृश्य हो गया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥