श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 27

 
श्लोक
तमृत्विज: शक्रवधाभिसन्धितंविचक्ष्य दुष्प्रेक्ष्यमसह्यरंहसम् ।
निवारयामासुरहो महामतेन युज्यतेऽत्रान्यवध: प्रचोदितात् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—राजा पृथु को; ऋत्विज:—पुरोहितगण; शक्र-वध—इन्द्र का वध; अभिसन्धितम्—अपने को तैयार करते हुए; विचक्ष्य— देखकर; दुष्प्रेक्ष्यम्—देखने में भयंकर; असह्य—असहनीय; रंहसम्—जिसका वेग; निवारयाम् आसु:—उन्होंने मना किया; अहो—ओह; महा-मते—हे महापुरुष; न—नहीं; युज्यते—आपको शोभनीय; अत्र—इस यज्ञ-स्थल में; अन्य—दूसरे; वध:— वध; प्रचोदितात्—शास्त्र-विहित ।.
 
अनुवाद
 
 जब पुरोहितों तथा अन्य सबों ने महाराज पृथु को अत्यन्त कुपित तथा इन्द्र वध के लिए उद्यत देखा तो उन्होंने प्रार्थना की : हे महात्मा, उसे मत मारें, क्योंकि यज्ञ में केवल यज्ञ-पशु का ही वध किया जा सकता है। शास्त्रों में ऐसे ही आदेश दिये गये हैं।
 
तात्पर्य
 पशु-वध कई उद्देश्यों से किया जाता है। इससे वैदिक मंत्रों के उचित उच्चारण की परीक्षा हो जाती है और यज्ञ-अग्नि में डाले गये पशु को नवीन जीवन प्रदान किया जाता है। भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने के लिए किये जा
रहे यज्ञ में किसी का वध नहीं होना चाहिए। तो भला इन्द्र को कैसे मारा जा सकता है, जो कि वास्तव में यज्ञ में पूजा जाता है और भगवान् का अंश है? अत: पुरोहितों ने राजा पृथु से अनुरोध किया कि वे इन्द्र का वध न करें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥