श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 32

 
श्लोक
पृथुकीर्ते: पृथोर्भूयात्तर्ह्येकोनशतक्रतु: ।
अलं ते क्रतुभि: स्विष्टैर्यद्भवान्मोक्षधर्मवित् ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
पृथु-कीर्ते:—व्यापक कीर्तिवाले; पृथो:—राज पृथु का; भूयात्—हो; तर्हि—अत:; एक-ऊन-शत-क्रतु:—निन्यानब्वे यज्ञ करनेवाला; अलम्—कोई लाभ नहीं, बस; ते—तुम्हारे; क्रतुभि:—यज्ञ करने से; सु-इष्टै:—सुसम्पन्न; यत्—क्योंकि; भवान्— आप; मोक्ष-धर्म-वित्—मोक्ष के मार्ग को जाननेवाले ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्माजी ने अन्त में कहा : “बस, महाराज पृथु के निन्यानब्वे यज्ञ ही रहने दो।” फिर वे महाराज पृथु की ओर मुड़े और उनसे कहा “आप मोक्ष मार्ग से भलीभाँति परिचित हैं, अत: आपको और अधिक यज्ञ करने से क्या मिलेगा?”
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी राजा पृथु को निरन्तर एक सौ यज्ञ सम्पन्न करने से रोकने आये थे। राजा पृथु सौ यज्ञ करने के लिए कृत-संकल्प थे और इन्द्र ने इसे गम्भीरता से लिया, क्योंकि वह शतक्रतु नाम से विख्यात था। जिस प्रकार इस भौतिक जगत में सभी जीवात्माओं का स्वभाव है कि वे अपने प्रतियोगियों से ईर्ष्या करते हैं, उसी प्रकार स्वर्ग का राजा इन्द्र राजा पृथु के प्रति ईर्ष्यालु था, अत: वह उनके एक सौ यज्ञों को सम्पन्न नहीं होने देना चाहता था। वस्तुत: एक प्रकार से काफी स्पर्धा थी और राजा पृथु को रोकने के लिए तथा अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए इन्द्र नाना प्रकार की अधार्मिक पद्धतियाँ चलाने लगा। इन
अधार्मिक कार्यों से विरत करने के लिए ब्रह्मा जी यज्ञस्थल पर स्वयं उपस्थित हुए। जहाँ तक महाराज पृथु का प्रश्न था, वे तो भगवान् के परम भक्त थे, अत: उनके लिए निर्दिष्ट वैदिक अनुष्ठानों को करने की कोई आवश्यकता न थी। ऐसे अनुष्ठान कर्म कहलाते हैं और दिव्य स्थिति को प्राप्त भक्त के लिए इन्हें करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। फिर भी आदर्श राजा होने के नाते यज्ञ करना पृथु का कर्तव्य था। अत: समझौता तैयार किया गया। ब्रह्माजी के आशीर्वाद से राजा पृथु इन्द्र से अधिक विख्यात होंगे। इस प्रकार राजा पृथु का एक सौ यज्ञ करने का संकल्प अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्मा के आशीर्वाद से पूरा हुआ।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥