श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 36

 
श्लोक
एभिरिन्द्रोपसंसृष्टै: पाखण्डैर्हारिभिर्जनम् ।
ह्रियमाणं विचक्ष्वैनं यस्ते यज्ञध्रुगश्वमुट् ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
एभि:—इन; इन्द्र-उपसंसृष्टै:—इन्द्र द्वारा विरचित; पाखण्डै:—पापपूर्ण कार्य द्वारा; हारिभि:—मनोहर; जनम्—सामान्य लोग; ह्रियमाणम्—चुराये गये; विचक्ष्व—देखो तो; एनम्—ये; य:—जो; ते—तुम्हारा; यज्ञ-ध्रुक्—यज्ञ में विघ्न उत्पन्न करके; अश्व- मुट्—घोड़े को चुरानेवाला ।.
 
अनुवाद
 
 जरा देखिये कि राजा इन्द्र यज्ञ के घोड़े को चुरा कर किस प्रकार यज्ञ में विघ्न डाल रहा था! उसके द्वारा प्रचारित मनोहर पापमय कार्य सामान्य जनों द्वारा आगे बढ़ाये जाते रहेंगे।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (३.२१) में कहा गया है—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

“महापुरुष जो जो आचरण करता है, साधारण मनुष्य उसका अनुसरण करते हैं। वह पुरुष अपने विलक्षण कर्मों से जो आदर्श स्थापित कर देता है, सम्पूर्ण विश्व उसके अनुसार कार्य करता है।” राजा इन्द्र ने अपनी इन्द्रिय-तृप्ति के लिए ही महाराज पृथु को एक सौ अश्वमेध यज्ञ न करने देने का विचार किया। अत: उसने घोड़ा चुरा लिया और वह अपने को अनेक अधार्मिक पुरुषों के बीच, संन्यासी का छद्म वेष धारण करके छिपाता रहा। ऐसे कार्य सामान्य लोगों को आकर्षक लगते हैं, अत: वे घातक हैं। ब्रह्माजी ने सोचा कि इन्द्र द्वारा इस प्रकार अधर्म फैलाने की अपेक्षा श्रेयस्कर यही होगा कि यज्ञ बन्द करा दिया जाय। भगवान् बुद्ध ने ऐसा ही कदम उठाया था, जब लोग वैदिक आदेशों द्वारा संस्तुत पशुयज्ञों में बुरी तरह फँसे हुए थे। भगवान् बुद्ध को वैदिक यज्ञों का निषेध करके अहिंसा धर्म का सूत्रपात करना पड़ा। वस्तुत: यज्ञों में वध किये गये पशुओं को नव जीवन प्रदान किया जाता था, किन्तु ऐसे लोग जो मंत्रशक्ति से रहित थे इन वैदिक अनुष्ठानों का लाभ उठा रहे थे और वृथा ही बेचारे पशुओं का वध कर रहे थे। अत: उस समय भगवान् बुद्ध को वेदों की सत्ता अस्वीकार करनी पड़ी। मनुष्य को ऐसे यज्ञ नहीं करने चाहिए जिनसे अव्यवस्था पनपे। ऐसे यज्ञों को बन्द करना ही श्रेयस्कर होगा।

जैसाकि हमने बारम्बार दुहराया है, कलियुग में सुयोग्य ब्राह्मणों के अभाव में वेद-विहित यज्ञों को सम्पन्न करना सम्भव नहीं है। इसीलिए शास्त्र संकीर्तन-यज्ञ करने का उपदेश देते हैं। संकीर्तन-यज्ञ से भगवान् चैतन्य के रूप में भगवान् प्रसन्न होंगे और पूजित होंगे। यज्ञों को सम्पन्न करने का एकमात्र उद्देश्य भगवान् विष्णु को प्रसन्न करना है। भगवान् विष्णु या श्रीकृष्ण भगवान् चैतन्य के रूप में विद्यमान हैं, अत: बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि संकीर्तन-यज्ञ द्वारा उन्हें तुष्ट करें। इस युग में भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने का यह एक सरलतम उपाय है। लोगों को चाहिए कि इस युग में विभिन्न शास्त्रों में यज्ञों के विषय में जो आदेश प्राप्त हैं, उनका लाभ उठाएँ और इस पापमय कलियुग में अनावश्यक उत्पात न फैलाएँ। इस कलियुग में सारे संसार के मनुष्य पशुओं के वध हेतु कसाईखाने खोलने में पटु हैं, क्योंकि वे पशु-मांस खाते हैं। यदि पहले जैसे धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं, तो पशुओं का वध और बढ़ेगा। कलकत्ता में अनेक कसाइयों की दुकानें हैं जिनमें देवी काली की प्रतिमा रखी रहती है और पशु-भक्षक लोग सोचते हैं कि ऐसी दुकानों से मांस खरीदना अच्छा होगा, क्योंकि यह तो देवीकाली के भोग का शेष अंश है। वे नहीं जानते कि देवी काली कभी भी मांसाहारी भोजन स्वीकार नहीं करतीं, क्योंकि वे शिवजी की साध्वी पत्नी हैं। शिवजी भी महान् वैष्णव हैं और कभी मांस नहीं खाते। देवी काली शिवजी का उच्छिष्ट ही ग्रहण करती हैं। अत: उनके द्वारा मांस या मछली खाये जाने की कोई सम्भावना नहीं है। ऐसी भेंटें तो देवी काली के पार्षद स्वीकार करते हैं, जिन्हें भूत, पिशाच तथा राक्षस कहा जाता है, अत: जो लोग देवी काली से मांस या मछली का प्रसाद प्राप्त करते हैं, वह उनका छोड़ा गया प्रसाद न होकर भूतों तथा पिशाचों का जूठन होता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥