श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 4

 
श्लोक
अन्वितो ब्रह्मशर्वाभ्यां लोकपालै: सहानुगै: ।
उपगीयमानो गन्धर्वैर्मुनिभिश्चाप्सरोगणै: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
अन्वित:—साथ में; ब्रह्म—ब्रह्मा द्वारा; शर्वाभ्याम्—तथा शिव द्वारा; लोक-पालै:—विभिन्न लोकों के प्रधानों द्वारा; सह अनुगै:—अपने-अपने अनुचरों के साथ; उपगीयमान:—प्रशंसित होकर; गन्धर्वै:—गन्धर्वलोक के वासियों द्वारा; मुनिभि:— मुनियों द्वारा; च—भी; अप्सर:-गणै:—अप्सरालोक के वासियों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 जब भगवान् विष्णु यज्ञस्थल में प्रकट हुए तो उनके साथ ब्रह्माजी, शिवजी तथा सभी लोकपाल एवं उनके अनुचर भी थे। जब वे वहाँ प्रकट हुए तो गन्धर्वलोक-निवासियों, ऋषियों तथा अप्सरा लोक के निवासियों सभी ने मिलकर प्रशंसा की।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥