श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
अयं तु लोकपालानां यशोघ्नो निरपत्रप: ।
सद्‌भिराचरित: पन्था येन स्तब्धेन दूषित: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
अयम्—यह (शिव); तु—लेकिन; लोक-पालानाम्—ब्रह्माण्ड के पालक; यश:-घ्न:—यश को नष्ट करने वाला; निरपत्रप:— निर्लज्ज; सद्भि:—सदाचारी पुरुषों द्वारा; आचरित:—पालन किया गया; पन्था:—पथ; येन—जिसके (शिव) द्वारा; स्तब्धेन— आचरणविहीन द्वारा; दूषित:—लाञ्छित ।.
 
अनुवाद
 
 शिव ने लोकपालकों के नाम तथा यश को धूल में मिला दिया है और सदाचार के पथ को दूषित किया है। निर्लज्ज होने के कारण उसे इसका पता नहीं है कि किस प्रकार से आचरण करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 दक्ष ने उस सभा में एकत्र सभी साधु पुरुषों को यह दिखाना चाहा कि देवता होकर भी शिव ने किस प्रकार अपने अशिष्ट आचरण द्वारा देवताओं की कीर्ति को नष्ट कर दिया है। दक्ष द्वारा भगवान् शिव के विरोध में कहे गये वचनों को दूसरे प्रकार से अच्छे संदर्भ में भी समझा जा सकता है। उदाहरणार्थ, दक्ष ने कहा कि वे यशोघ्न हैं जिसका अर्थ होता है, “नाम तथा यश को नष्ट करने वाला” किन्तु इसका यह भी अर्थ लगाया जा सकता है कि वे इतने विख्यात थे कि उनके यश से अन्यों का यश नष्ट हो गया। दक्ष ने एक अन्य शब्द निरपत्रप का भी प्रयोग किया, जो दो अर्थों में प्रयुक्त हो सकता है। एक अर्थ है, “जो बौना है” तथा दूसरा अर्थ है “आश्रयहीनों का पालनहारा।” सामान्य रूप से शिव भूतनाथ अर्थात् निम्न कोटि के प्राणियों के स्वामी के नाम से विख्यात हैं। भूत का अर्थ है, “निम्नकोटि के प्राणी।” ये भगवान् शिव की शरण में जाते हैं क्योंकि वे सबों पर दया करने वाले और जल्दी प्रसन्न होने वाले हैं। इसीलिए वे आशुतोष कहलाते हैं। ऐसे मनुष्यों के लिए, जो अन्य देवों या विष्णु के पास नहीं पहुँच पाते, शिव शरण देने वाले हैं। अत: निरपत्रप शब्द इसी अर्थ में लिया जा सकता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥