श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक
प्रेतावासेषु घोरेषु प्रेतैर्भूतगणैर्वृत: ।
अटत्युन्मत्तवन्नग्नो व्युप्तकेशो हसन् रुदन् ॥ १४ ॥
चिताभस्मकृतस्‍नान: प्रेतस्रङ्‌न्रस्थिभूषण: ।
शिवापदेशो ह्यशिवो मत्तो मत्तजनप्रिय: ।
पति: प्रमथनाथानां तमोमात्रात्मकात्मनाम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
प्रेत-आवासेषु—श्मशान में; घोरेषु—भयंकर; प्रेतै:—प्रेतों द्वारा; भूत-गणै:—भूतों द्वारा; वृत:—घिरा हुआ, संग में; अटति— घूमता है; उन्मत्त-वत्—पागल के समान; नग्न:—नंगा; व्युप्त-केश:—बिखरे बालों वाला; हसन्—हँसता हुआ; रुदन्— चिल्लाता है; चिता—चिता की; भस्म—राख से; कृत-स्नान:—नहाकर (लगाकर); प्रेत—शवों के मुंडों की; स्रक्—माला; नृ-अस्थि-भूषण:—मृत पुरुषों की अस्थियों को आभूषण बनाये हुए; शिव-अपदेश:—जो नाम का शिव (शुभ) है; हि— क्योंकि; अशिव:—अमंगल; मत्त:—विक्षिप्त; मत्त-जन-प्रिय:—विक्षिप्तों को प्रिय लगने वाला; पति:—नायक, स्वामी; प्रमथ-नाथानाम्—प्रमथों के स्वामियों का; तम:-मात्र-आत्मक-आत्मनाम्—तमोगुणी इन सबों का ।.
 
अनुवाद
 
 वह श्मशान जैसे गंदे स्थानों में रहता है और उसके साथ भूत तथा प्रेत रहते हैं। वह पागलों के समान नंगा रहता है, कभी हँसता है, तो कभी चिल्लाता है और सारे शरीर में श्मशान की राख लपेटे रहता है। वह ठीक से नहाता भी नहीं। वह खोपडिय़ों तथा अस्थियों की माला से अपने शरीर को विभूषित करता है। अत: वह केवल नाम से ही शिव है, अन्यथा वह अत्यन्त प्रमत्त तथा अशुभ प्राणी है। वह केवल तामसी प्रमत्त लोगों का प्रिय है और उन्हीं का अगुवा है।
 
तात्पर्य
 जो नियमित रूप से नहाते नहीं उनकी संगति प्रेतों तथा पागल लोगों से मानी जाती है। शिवजी ऐसे ही लगते थे, किन्तु उनका शिव नाम अत्यन्त उपयुक्त है, क्योंकि वे ऐसे व्यक्तियों पर अत्यन्त दयालु रहते हैं, जो तमोगुम के घोर अंधकार में पड़े हुए हैं—यथा अस्वच्छ शराबी लोग जो नियमित रूप से स्नान भी नहीं करते। भगवान् शिव इतने कृपालु हैं कि वे ऐसे प्राणियों को शरण प्रदान करते हैं और उन्हें क्रमश: आत्मिक चेतना तक ऊपर ले जाते हैं। यद्यपि ऐसे लोगों को आत्मिक ज्ञान के धरातल तक उठा पाना कठिन है, किन्तु भगवान् शिव इसका उत्तरदायित्व स्वयं लेते हैं इसीलिए, जैसाकि वेदों में कहा गया है, शिवजी सर्व-मंगलकारी हैं। इस तरह उनकी संगति से ऐसी पतित आत्माएँ भी ऊपर उठ सकती हैं। कभी-कभी यह देखा गया है कि महापुरुष की भेंट पतित आत्माओं के हितार्थ होती है, न कि उनके निजी हित के लिए। भगवान् की इस सृष्टि में अनेक प्रकार के जीव हैं। इनमें से कुछ सतोगुण-संपन्न हैं, तो कुछ रजोगुण तथा तमोगुण से युक्त होते हैं। भगवान् विष्णु ऐसे लोगों का भार अपने ऊपर लेते हैं, जो कृष्णभावनाभावित उन्नत वैष्णव हैं। भगवान् ब्रह्मा सकाम कर्म में अनुरक्त लोगों का भार ग्रहण करते हैं, किन्तु शिवजी इतने दयालु हैं कि वे उन सभी लोगों का भार लेते हैं, जो तमोगुणी हैं और जिनके आचरण पशुओं से भी गिरे हुए हैं। इसीलिए शिव को विशेष रूप से मंगलकारी कहा गया है।
 
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