श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
विज्ञाय शापं गिरिशानुगाग्रणी-
र्नन्दीश्वरो रोषकषायदूषित: ।
दक्षाय शापं विससर्ज दारुणं
ये चान्वमोदंस्तदवाच्यतां द्विजा: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
विज्ञाय—जानकर; शापम्—शाप; गिरिश—शिव का; अनुग-अग्रणी:—प्रमुख पार्षदों में से एक; नन्दीश्वर:—नन्दीश्वर; रोष— क्रोध; कषाय—लाल; दूषित:—अंध; दक्षाय—दक्ष को; शापम्—शाप; विससर्ज—दिया; दारुणम्—कठोर; ये—जिन्होंने; च—तथा; अन्वमोदन्—सहन किया; तत्-अवाच्यताम्—शिव को शाप देना; द्विजा:—ब्राह्मणजन ।.
 
अनुवाद
 
 यह जानकर कि भगवान् शिव को शाप दिया गया है, शिव का प्रमुख पार्षद नन्दीश्वर अत्यधिक क्रुद्ध हुआ। उसकी आँखें लाल हो गईं और उसने दक्ष तथा वहाँ उपस्थित सभी ब्राह्मणों को, जिन्होंने दक्ष द्वारा कटु वचनों में शिवजी को शापित किए जाने को सहन किया था, शाप देने की तैयारी की।
 
तात्पर्य
 कुछ नवदीक्षित वैष्णवों तथा शैवों में दीर्घकालीन मतभेद चला आ रहा है; वे सदैव भिड़ते रहते हैं। जब दक्ष ने कटु वचनों द्वारा शिव को शाप दिया तो वहाँ उपस्थित कुछ ब्राह्मणों को मजा आया होगा क्योंकि कुछ ब्राह्मण शिव को अधिक पसंद नहीं करते हैं। वे शिव की स्थिति को न समझने के कारण ऐसा करते हैं। इस शाप से नन्दीश्वर प्रभावित हुआ, किन्तु उसने वहाँ पर उपस्थित भगवान् शिव का अनुकरण नहीं किया। यदि शिवजी चाहते तो वे भी दक्ष को उसी प्रकार शाप दे सकते थे, किन्तु वे शान्त बने रहे। किन्तु उनका अनुयायी नन्दीश्वर इसे सहन नहीं कर सका। निस्सन्देह, अनुयायी होने के कारण यह उचित ही था कि वह अपने स्वामी की निन्दा सहन न करता, किन्तु उसे वहाँ उपस्थित ब्राह्मणों को शाप नहीं देना चाहिए था। इससे सारा मामला ऐसा उलझ गया कि जो अधिक बलशाली न थे वे अपने पदों को भूल गये और इस तरह उस सभा में शाप-प्रतिशाप चलता रहा। कहने का तात्पर्य यह है कि भौतिक जगत ऐसा अस्थिर है कि वहाँ उपस्थित नन्दीश्वर, दक्ष तथा अनेक ब्राह्मण रोष के वातावरण से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥