श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि ।
द्रुह्यत्यज्ञ: पृथग्दृष्टिस्तत्त्वतो विमुखो भवेत् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो (दक्ष); एतत् मर्त्यम्—इस नश्वर शरीर के; उद्दिश्य—प्रसंग में; भगवति—शिव को; अप्रतिद्रुहि—जो ईर्ष्यालु नहीं हैं; द्रुह्यति—द्वेष करता है; अज्ञ:—कम बुद्धिमान व्यक्ति; पृथक्-दृष्टि:—द्वैत भाव; तत्त्वत:—दिव्य ज्ञान से; विमुख:—रहित; भवेत्—हो जाए ।.
 
अनुवाद
 
 जिस किसी ने दक्ष को सर्वश्रेष्ठ पुरुष मान कर ईर्ष्यावश भगवान् शिव का निरादर किया है, वह अल्प बुद्धिवाला है और अपने द्वैतभाव के कारण वह दिव्यज्ञान से विहीन हो जाएगा।
 
तात्पर्य
 नन्दीश्वर का प्रथम शाप था कि जो भी दक्ष का समर्थन कर रहा है, वह अज्ञानवश अपने शरीर को ही सब कुछ समझ रहा है और चूँकि दक्ष को दिव्य ज्ञान नहीं था, अत: उसका समर्थन करने से वह भी दिव्य ज्ञान से विहीन हो जाएगा। नन्दीश्वर ने कहा कि दक्ष अन्य भौतिकतावादी व्यक्तियों की तरह अपने शरीर को ही सब कुछ मान बैठा है और सभी शारीरिक
सुख-सुविधाएँ प्राप्त करना चाह रहा है। उसे अपने शरीर, अपनी पत्नी, सन्तान, घर तथा अन्य ऐसी वस्तुओं में, जो आत्मा से भिन्न हैं, अत्यधिक आसक्ति है। अत: नन्दीश्वर का शाप था कि जो भी दक्ष का समर्थक होगा वह दिव्य आत्मज्ञान से विहीन हो जाएगा और इस तरह वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के ज्ञान से भी विमुख होगा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥