श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
सर्वभक्षा द्विजा वृत्त्यै धृतविद्यातपोव्रता: ।
वित्तदेहेन्द्रियारामा याचका विचरन्त्विह ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
सर्व-भक्षा:—सब कुछ खाने वाले; द्विजा:—ब्राह्मण लोग; वृत्त्यै—शरीर पालने के लिए; धृत-विद्या—शिक्षा का कार्य ग्रहण करके; तप:—तपस्या; व्रता:—तथा व्रत; वित्त—धन; देह—शरीर; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; आरामा:—तुष्टि; याचका:—भिक्षुकों के समान; विचरन्तु—इधर-उधर घूमें; इह—यहाँ ।.
 
अनुवाद
 
 ये ब्राह्मण केवल अपने शरीर-पालन के लिए विद्या, तप तथा व्रतादि का आश्रय लें। इन्हें भक्ष्याभक्ष्य का विवेक न रह जाए। ये द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर अपने शरीर की तुष्टि के लिए धन की प्राप्ति करें।
 
तात्पर्य
 नन्दीश्वर ने दक्ष को समर्थन देनेवाले ब्राह्मणों को जो तीसरा शाप दिया वह पूरी तरह कलियुग में लागू होता है। तथाकथित ब्राह्मण अब परब्रह्म के स्वरूप को समझने में कोई रुचि नहीं दिखाते, यद्यपि ब्राह्मण का अर्थ है, वह जिसने ब्रह्म विषयक ज्ञान प्राप्त कर लिया है। वेदान्त सूत्र में भी कहा गया है अथातो ब्रह्मजिज्ञासा: यह मनुष्य जीवन परब्रह्म की अनुभूति के लिए है, अर्थात् मनुष्य जीवन का उद्देश्य ब्राह्मण-पद तक ऊपर उठना है। दुर्भाग्यवश आधुनिक ब्राह्मण अथवा तथाकथित ब्राह्मण परिवारों में उत्पन्न ब्राह्मण अपने-अपने व्यावसायिक कर्म (धर्म) त्याग चुके हैं, किन्तु फिर भी वे अन्य किसी को अपना स्थान ग्रहण करने नहीं देना चाहते। शास्त्रों, श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता तथा अन्य वैदिक साहित्य में ब्राह्मणों के गुण बताये गये है। ब्राह्मण कोई आनुवंशिक पदवी या पद नहीं है। यदि कोई अब्राह्मण (उदाहरणार्थ, शूद्र कुल में उत्पन्न) प्रामाणिक गुरु द्वारा उचित शिक्षा पाकर योग्य बन कर ब्राह्मण बनना चाहता है, तो ये तथाकथित ब्राह्मण विरोध करते हैं। नन्दीश्वर द्वारा शापित ऐसे ब्राह्मण ऐसी स्थिति में हैं कि उन्हें भक्ष्याभक्ष्य का कोई विवेक नहीं रह गया है और वे इस मर्त्य देह तथा अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए ही जीवित रहते हैं। ऐसे पतित बद्धजीव ब्राह्मण कहलाने के योग्य नहीं हैं, किन्तु कलियुग में वे अपने को ब्राह्मण होने का दावा करते हैं और यदि कोई मनुष्य वास्तव में ब्राह्मणत्व प्राप्त करने का प्रयास करता है, तो वे उसके मार्ग में बाधक बनते हैं। आधुनिक युग में ऐसी ही स्थिति आ गई है। चैतन्य महाप्रभु ने इस सिद्धान्त की घोर निन्दा की है। रामानन्द राय से वार्तालाप के दौरान उन्होंने कहा है कि मनुष्य चाहे ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न हुआ हो या शूद्र कुल में, चाहे वह गृहस्थ हो या संन्यासी, यदि वह कृष्ण-विज्ञान जानता है, तो वह गुरु बन सकता है। चैतन्य महाप्रभु के कई शूद्र शिष्य थे, यथा हरिदास ठाकुर तथा रामानन्द राय। यहाँ तक कि सभी गोस्वामी, जो चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख छात्र थे, ब्राह्मण समाज से च्युत थे, किन्तु उन्होंने कृपा करके उन्हें उच्चकोटि का वैष्णव बना दिया।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥