श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
ब्रह्म च ब्राह्मणांश्चैव यद्यूयं परिनिन्दथ ।
सेतुं विधारणं पुंसामत: पाषण्डमाश्रिता: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
ब्रह्म—वेद; च—तथा; ब्राह्मणान्—ब्राह्मणों को; च—तथा; एव—निश्चय ही; यत्—क्योंकि; यूयम्—तुम सब; परिनिन्दथ— निन्दा करते हो; सेतुम्—वैदिक सिद्धान्त; विधारणम्—धारण करते हुए; पुंसाम्—मनुष्य जाति का; अत:—इसलिए; पाषण्डम्—नास्तिकता; आश्रिता:—शरण ले रखी है ।.
 
अनुवाद
 
 भृगु मुनि ने आगे कहा : चूँकि तुम वैदिक नियमों के अनुयायी ब्राह्मणों तथा वेदों की निन्दा करते हो इससे ज्ञात होता है कि तुमने नास्तिकता की नीति अपना रखी है।
 
तात्पर्य
 भृगु मुनि ने नन्दीश्वर को शाप देते हुए कहा कि वे सब इस शाप से नास्तिक तो होंगे ही, किन्तु वे पहले से नास्तिक पद तक गिर चुके थे, क्योंकि उन्होंने मानवीय सभ्यता के परम स्रोत वेदों की निन्दा की थी। गुणों के अनुसार श्रेणियों में विभाजित मानवीय-सभ्यता वर्णाश्रम पर आधारित है, यथा-बुद्धिमान वर्ग, युद्धप्रिय वर्ग, उत्पादक वर्ग तथा श्रमिक वर्ग। वेद सही-सही निर्देश देते हैं कि आत्म-अनुशीलन तथा आर्थिक उन्नति के साथ ही इन्द्रिय-तृप्ति का नियमन कैसे किया जाये जिससे अन्तत: भौतिक कल्मष से छूट कर मनुष्य अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान (अहं ब्रह्मास्मि) को प्राप्त हो। जब तक मनुष्य सांसारिक कल्मष में रहता है, तब तक वह जलचर से लेकर ब्रह्मा तक अपनी योनियाँ बदलता रहता है, किन्तु इस जगत में तो मनुष्य जीवन सर्वोच्च सिद्धि है। वेद वह मार्ग दिखाते हैं जिससे मनुष्य अगले जीवन में ऊपर उठ सके। ऐसी शिक्षा के लिए वेद माता तुल्य हैं और वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण पिता तुल्य हैं, अत: यदि कोई वेदों तथा बाह्मणों की निन्दा करता है, तो वह नास्तिक के स्तर पर गिर जाता है। संस्कृत में नास्तिक शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो उस मनुष्य का द्योतक है, जो वेदों में विश्वास नहीं करता और धर्म की कुछ मनगढंत पद्धति का निर्माण करता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि बौद्ध धर्म के अनुयायी नास्तिक हैं। अहिंसा के सिद्धान्त की स्थापना के लिए भगवान् बुद्ध ने वेदों को मानने से साफ इनकार किया और बाद में शंकराचार्य ने इस धर्म को भारत में रोका और इसे देश के बाहर निकलने के लिए बाध्य किया। यहाँ पर ब्रह्म च ब्राह्मणान् कहा गया है। ब्रह्म का अर्थ है वेद। अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है “मुझे पूर्ण ज्ञान प्राप्त है।” वेदों का कथन है कि मनुष्य को अपने आपको ब्रह्म समझना चाहिए क्योंकि वह वास्तव में ब्रह्म है। यदि ब्रह्म अर्थात् वैदिक ज्ञान की निन्दा की जाये और वैदिक ज्ञान के ज्ञाता ब्राह्मणों की निन्दा की जाये तो फिर यह मानवीय सभ्यता कहाँ रहेगी? भृगु मुनि ने कहा, “ऐसा नहीं है कि तुम लोग मेरे शाप से नास्तिक बनोगे, तुम तो पहले से नास्तिक हो, इसीलिए तुम निन्दनीय हो।”
 
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