श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
एष एव हि लोकानां शिव: पन्था: सनातन: ।
यं पूर्वे चानुसन्तस्थुर्यत्प्रमाणं जनार्दन: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—वेद; एव—निश्चय ही; हि—क्योंकि; लोकानाम्—समस्त लोगों का; शिव:—कल्याणकारी; पन्था:—पथ; सनातन:— शाश्वत; यम्—जो (वैदिक पथ); पूर्वे—भूतकाल में; च—तथा; अनुसन्तस्थु:—दृढ़तापूर्वक पालित होता था; यत्—जिसमें; प्रमाणम्—साक्ष्य; जनार्दन:—जनार्दन ।.
 
अनुवाद
 
 वेद मानवीय सभ्यता के कल्याण की प्रगति हेतु शाश्वत विधान प्रदान करने वाले हैं जिसका प्रीचीन काल में दृढ़ता से पालन होता रहा है। इसका सशक्त प्रमाण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वयं हैं, जो जनार्दन अर्थात् समस्त जीवात्माओं के शुभेच्छु कहलाते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने दावा किया है कि वे सभी प्रकार के प्राणियों के जनक हैं। कुल मिलाकर ८४,००,००० योनियाँ हैं और श्रीकृष्ण अपने को इन सबका जनक कहते हैं। चूँकि जीवात्माएँ भगवान् के अंशरूप हैं, अत: वे भगवान् की सन्तानें हैं। चूंकि उन्हें गुमान है कि वे भौतिक प्रकृति को वश में कर सकते हैं, भगवान् ने उनके हितार्थ उन्हें वेद प्रदान किये हैं। इसीलिए वेद अपौरुषेय कहलाते हैं, क्योंकि वे मनुष्यों या देवताओं द्वारा नहीं लिखे गए, यहाँ तक कि ब्रह्मा, जो आदि जीव हैं, वे भी वेदों के रचयिता नहीं हैं। इस भौतिक जगत के ही एक सजीव प्राणी होने के कारण वे न तो वेदों की रचना कर सकते हैं और न स्वतंत्र रूप से उनके विषय में कुछ कह सकते हैं। इस संसार की प्रत्येक जीवात्मा में चार अवगुण पाये जाते हैं—त्रुटि करना, एक वस्तु को दूसरी समझना, धोखा देना तथा इन्द्रियों से अपूर्ण होना। किन्तु वेद इस भौतिक संसार के किसी सजीव प्राणी द्वारा रचित नहीं हैं, अत: वे अपौरुषेय कहलाते हैं। कोई भी वेदों का इतिहास नहीं बता सकता। निस्सन्देह, आधुनिक मानवीय सभ्यता का कोई तिथिवार इतिहास नहीं है और तीन हजार वर्ष से पूर्व का भी वास्तविक इतिहास प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। किसी ने आज तक यह शोध नहीं की कि वेद कब लिखे गये, क्योंकि वे इस संसार के किसी सजीव प्राणी द्वारा नहीं लिखे गये। अन्य सभी ज्ञानपद्धतियाँ दोषपूर्ण हैं, क्योंकि वे इसी भौतिक संसार के प्राणियों या देवताओं द्वारा रचित या उच्चरित हैं। किन्तु भगवद्गीता अपौरुषेय है, क्योंकि इसे इस भौतिक सृष्टि के किसी मनुष्य या देवता ने नहीं कहा, इसको श्रीकृष्ण ने कहा है, जो इस भौतिक सृष्टि से परे हैं। इसे शंकराचार्य जैसे उद्भट विद्वानों ने स्वीकार किया है, रामानुजाचार्य तथा मध्यवाचार्य जैसे अन्य आचार्यों की तो बात ही छोड़ दें। शंकराचार्य ने स्वीकार किया है कि नारायण तथा कृष्ण दिव्य हैं और भगवान् श्रीकृष्ण ने भी भगवद्गीता में परिपुष्टि की है—अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते—मैं प्रत्येक वस्तु का मूल हूँ, प्रत्येक वस्तु मुझी से उद्भूत है। यह भौतिक सृष्टि जिसमें ब्रह्मा, शिव तथा सभी देवता सम्मिलित हैं, उन्हीं भगवान् द्वारा उत्पन्न की गई है, क्योंकि प्रत्येक वस्तु उन्हीं से उद्भूत है। वे यह भी कहते हैं कि मुझे समझने के लिए ही सारे वेद हैं (वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्य:)। वे ही मूल वेदवित् (वेदों के ज्ञाता) तथा वेदान्तकृत (वेदान्त के संकलनकर्ता) हैं। वेदों के संकलनकर्ता ब्रह्मा नहीं हैं।
श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में कहा गया है—तेने ब्रह्महृदा—भगवान् ने ब्रह्मा के हृदय में वैदिक ज्ञान का उपदेश दिया। वैदिक ज्ञान चारों दोषों—त्रुटि, मोह, प्रवंचना तथा अपूर्णता—से रहित है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि इसे भगवान् जनार्दन ने कहा और अनादि काल से, ब्रह्मा से प्रारम्भ होकर आज तक, उसका अनुगमन किया जा रहा है। अनादि काल से भारत की सुसंस्कृत जनता वैदिक धर्म का पालन करती आ रही है, कोई भी वैदिक धर्म के इतिहास को बता नहीं सकता। अत: यह सनातन है और यदि वेदों की निन्दा की जाती है, तो वह नास्तिकता है। वेदों को सेतु कहा गया जिसका अर्थ है ‘पुल’। यदि कोई आत्मतत्त्व प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अज्ञानता का सागर पार करना होता है। वेद ही वह सेतु (पुल) हैं जिससे इस विशाल सागर को पार किया जा सकता है।

वेदों में बताया गया है कि गुण तथा कर्म के अनुसार किस प्रकार मानव जाति को चार वर्गों में विभाजित किया गया है। यह वर्गीकरण अत्यन्त वैज्ञानिक और सनातन है, क्योंकि कोई इसका इतिहास नहीं बता सकता। वर्ण तथा आश्रम प्रणाली को कोई रोक नहीं सकता। उदाहरणार्थ, कोई ब्राह्मण नाम को स्वीकार करे अथवा नहीं, किन्तु समाज में एक बुद्धिमान वर्ग है, जो आध्यात्मिक ज्ञान तथा दर्शन में रुचि रखता है। इसी प्रकार से एक ऐसा वर्ग है, जो प्रशासन चलाने तथा अन्यों पर शासन करने में रुचि रखता है। वैदिक प्रणाली में इन सैनिक मनोवृत्ति वाले लोगों को क्षत्रिय कहा जाता है। इसी प्रकार से सर्वत्र मनुष्यों का एक ऐसा वर्ग है, जो आर्थिक विकास, व्यापार, उद्योग और अर्थोपार्जन में रुचि रखता है, जिन्हें वैश्य कहते हैं। एक ऐसा भी वर्ग है, जो न तो बुद्धिमान है, न पराक्रमी है और न उसमें आर्थिक विकास करने की क्षमता है। वह केवल अन्यों की सेवा कर सकता है। इन्हें शूद्र या श्रमिक वर्ग कहते हैं। यह प्रणाली सनातन है—यह अनन्त काल से चली आ रही है और इसी प्रकार आगे भी चलती रहेगी। विश्व की कोई भी शक्ति इसे रोक नहीं सकती। अत: सनातन धर्म शाश्वत है और वैदिक नियमों का पालन करते हुए कोई भी मनुष्य आध्यात्मिक जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

कहा जाता है कि पहले साधु पुरुष इस प्रणाली का अनुसरण करते थे, अत: वैदिक प्रणाली के अनुगमन का अर्थ हुआ समाज के आदर्श शिष्टाचार का पालन। किन्तु शिव के अनुयायी समस्त मानवीय शिष्टाचार के विरुद्ध हैं, क्योंकि वे मद्यपान करने वाले, नशीला एवं विषयी जीवन बिताने वाले, स्नान न करने वाले तथा गाँजा पीने वाले हैं। निष्कर्ष यह निकला कि जो व्यक्ति वैदिक नियमों के प्रति विद्रोह करते हैं, वे स्वयं इसके प्रमाण हैं कि वेद आधिकारिक हैं, क्योंकि वेदों का पालन न करने से ही वे पशुवत् बनते हैं। ऐसे पाशविक व्यक्ति ही साक्षात् प्रमाण हैं कि वैदिक नियम सर्वोच्च हैं।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥