श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
पुरा विश्वसृजां सत्रे समेता: परमर्षय: ।
तथामरगणा: सर्वे सानुगा मुनयोऽग्नय: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय मुनि ने कहा; पुरा—पहले (स्वायंभुव मनु के काल में); विश्व-सृजाम्—ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वालों के; सत्रे—यज्ञ में; समेता:—एकत्र हुए; परम-ऋषय:—बड़े-बड़े ऋषि; तथा—और भी; अमर-गणा:—देवता; सर्वे—सभी; स-अनुगा:—अपने-अपने अनुयायियों सहित; मुनय:—विचारक, चिन्तक; अग्नय:—अग्निदेव ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ने कहा : प्राचीन समय में एक बार ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वाले प्रमुख नायकों ने एक महान् यज्ञ सम्पन्न किया जिसमें सभी ऋषि, चिन्तक (मुनि), देवता तथा अग्निदेव अपने- अपने अनुयायियों सहित एकत्र हुए थे।
 
तात्पर्य
 विदुर द्वारा पूछे जाने पर मैत्रेय मुनि शिव तथा दक्ष के मनोमालिन्य का विस्तार से वर्णन करने लगे जिसके कारण सती को प्राण देने पड़े। इस प्रकार उस महान् यज्ञ का इतिहास प्रारम्भ होता है, जिससे ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वाले नायकों ने, जिनके नाम मरीचि, दक्ष तथा वसिष्ठ हैं, सम्पन्न किया। इन महापुरुषों ने एक विशाल यज्ञ की व्यवस्था की जिसमें अपने-अपने अनुयायियों सहित इन्द्र तथा अग्निदेव जैसे देवता एकत्रित हुए। ब्रह्मा तथा शिवजी भी उपस्थित हुए।
 
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