श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
तत्र प्रविष्टमृषयो दृष्ट्वार्कमिव रोचिषा ।
भ्राजमानं वितिमिरं कुर्वन्तं तन्महत्सद: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ; प्रविष्टम्—प्रविष्ट हुआ; ऋषय:—ऋषिगण; दृष्ट्वा—देखकर; अर्कम्—सूर्य; इव—सदृश्य; रोचिषा—कान्ति से; भ्राजमानम्—चमकते हुए, देदीप्यमान; वितिमिरम्—अंधकार से रहित; कुर्वन्तम्—करते हुए; तत्—वह; महत्—महान; सद:—सभा ।.
 
अनुवाद
 
 जब प्रजापतियों के नायक दक्ष ने सभा में प्रवेश किया, तो सूर्य के तेज के समान चमकीली कान्ति से युक्त उसके शरीर से सारी सभा प्रकाशित हो उठी और उसके समक्ष सभी समागत महापुरुष तुच्छ लगने लगे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥