श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
प्राङ्‍‌निषण्णं मृडं दृष्ट्वा नामृष्यत्तदनाद‍ृत: ।
उवाच वामं चक्षुर्भ्यामभिवीक्ष्य दहन्निव ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
प्राक्—पहले से; निषण्णम्—बैठा; मृडम्—शिवजी को; दृष्ट्वा—देखकर; न अमृष्यत्—सहन न कर सका; तत्—उनके (शिव) द्वारा; अनादृत:—आदर न किया जाकर; उवाच—कहा; वामम्—बेईमान; चक्षुर्भ्याम्—दोनों नेत्रों से; अभिवीक्ष्य— देखते हुए; दहन्—ज्वलित; इव—मानो ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु आसन ग्रहण करने के पूर्व शिवजी को बैठा हुआ और उन्हें सम्मान न प्रदर्शित करते हुए देखकर दक्ष ने इसे अपना अपमान समझा। उस समय दक्ष अत्यन्त क्रुद्ध हुआ। उसकी आँखें तप रही थीं। उसने शिव के विरुद्ध अत्यन्त कटु शब्द बोलना प्रारम्भ किया।
 
तात्पर्य
 दक्ष के दामाद होने के कारण यह आशा की जाती थी कि शिवजी अपने श्वसुर के सम्मानार्थ अन्यों के साथ उठकर खड़े होंगे, किन्तु भगवान् ब्रह्मा तथा शिव प्रमुख देवता हैं, अत: उनका पद दक्ष से बड़ा है। तो भी दक्ष इसे सहन न कर सका और उसने इसे अपने दामाद द्वारा अपना अपमान समझा। इसके पहले से ही वह शिवजी से सन्तुष्ट न था, क्योंकि शिवजी निर्धन दिखाई देते थे और उनका वेष अत्यन्त दरिद्र था।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥