श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
श्रूयतां ब्रह्मर्षयो मे सहदेवा: सहाग्नय: ।
साधूनां ब्रुवतो वृत्तं नाज्ञानान्न च मत्सरात् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
श्रूयताम्—सुनो; ब्रह्म-ऋषय:—हे ब्रह्मर्षियों; मे—मुझको; सह-देवा:—हे देवताओ; सह-अग्नय:—हे अग्नि देवो; साधूनाम्— सज्जनो के; ब्रुवत:—बोलते हुए; वृत्तम्—व्यवहार, आचार; न—नहीं; अज्ञानात्—अज्ञान से; न च—तथा नहीं; मत्सरात्—द्वेष से ।.
 
अनुवाद
 
 हे समस्त उपस्थित ऋषियो, ब्राह्मणो तथा अग्निदेवो, ध्यानपूर्वक सुनो क्योंकि मैं शिष्टाचार के विषय में बोल रहा हूँ। मैं किसी अज्ञानता या ईर्ष्या से नहीं कह रहा।
 
तात्पर्य
 शिव के विरुद्ध बोलते हुए दक्ष ने यह कहकर सभा को अत्यन्त चतुरतापूर्वक शान्त करना चाहा कि वह सज्जनों के आचार (शिष्टाचार) के विषय में बोलने जा रहा है, क्योंकि इससे सभा में उपद्रव होने की आशंका थी और लोग अप्रसन्न हो सकते थे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि कोई अभद्र पुरुष भी अपमानित हो। दूसरे शब्दों में, उसे यह पता था कि वह शिव के विरुद्ध बोल रहा था, जो आचरण निष्कलुष थे। जहाँ तक ईर्ष्या-द्वेष की बात है, वह पहले से ही शिवजी से द्वेष रखता था, फलत: उसने अपने द्वेष को प्रकट नहीं होने दिया। यद्यपि वह इस प्रकार बोल रहा था, जैसे उसे कुछ ज्ञात न हो, किन्तु यह कह कर कि वह किसी ईर्ष्या-द्वेषवश नहीं बोल रहा, अपनी बात को छिपा लेना चाहता था।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥