श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 10

 
श्लोक
परित्यक्तगुण: सम्यग्दर्शनो विशदाशय: ।
शान्तिं मे समवस्थानं ब्रह्म कैवल्यमश्नुते ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
परित्यक्त-गुण:—जो गुणों से विरक्त है; सम्यक्—सम; दर्शन:—जिसकी दृष्टि; विशद—अकलुषित; आशय:—जिसका मन या हृदय; शान्तिम्—शान्ति; मे—मेरा; समवस्थानम्—समान पद; ब्रह्म—आत्मा; कैवल्यम्—भौतिक कल्मष से मुक्ति; अश्नुते—प्राप्त करता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब हृदय समस्त भौतिक कल्मषों से शुद्ध हो जाता है, तो भक्त का मन विशद तथा पारदर्शी हो जाता है और वह वस्तुओं को समान रूप में देख सकता है। जीवन की इस अवस्था में शान्ति मिलती है और मनुष्य मेरे समान पद के सच्चिदानन्द-विग्रह रूप में स्थित हो जाता है।
 
तात्पर्य
 मायावादी कैवल्य सम्बन्धी विचार वैष्णवों के विचारों से भिन्न है। मायावादी सोचता है कि ज्योंही कोई समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है, वह परमेश्वर में तदाकार हो जाता है। वैष्णव चिन्तक की कैवल्य सम्बन्धी विचारधारा भिन्न है। वह अपनी तथा भगवान् दोनों की स्थितियों को समझता है। अकलुषित
अवस्था में जीवात्मा अपने को परमात्मा का नित्य दास मानता है, जो ब्रह्म-साक्षात्कार कहलाता है। यह पद सरलता से प्राप्त हो जाता है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, जब कोई भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में अनुरक्त रहता है, तो उसे तुरन्त ही दिव्य कैवल्य पद अथवा ब्रह्मपद प्राप्त होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥