श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 15

 
श्लोक
एवं द्विजाग्र्यानुमतानुवृत्त
धर्मप्रधानोऽन्यतमोऽवितास्या: ।
ह्रस्वेन कालेन गृहोपयातान्
द्रष्टासि सिद्धाननुरक्तलोक: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; द्विज—ब्राह्मणों का; अछय—अग्रणी द्वारा; अनुमत—स्वीकृत; अनुवृत्त—गुरु परम्परा से प्राप्त; धर्म— धार्मिक सिद्धान्त; प्रधान:—प्रमुख; अन्यतम:—अनासक्त; अविता—रक्षक; अस्या:—पृथ्वी का; ह्रस्वेन—लघु; कालेन— समय से; गृह—अपने घर; उपयातान्—स्वत: आया हुआ; द्रष्टासि—तुम देखोगे; सिद्धान्—सिद्ध पुरुष; अनुरक्त-लोक:—प्रजा का प्रिय ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् विष्णु ने आगे कहा : हे राजा पृथु, यदि तुम विद्वान् ब्राह्मणों से शिष्य परम्परा द्वारा प्राप्त आदेशों के अनुसार प्रजा का संरक्षण करते रहोगे और यदि तुम उनके द्वारा निर्दिष्ट धार्मिक नियमों का अनुसरण मनोरथों से अनासक्त रहकर करते रहोगे तो तुम्हारी सारी प्रजा सुखी रहेगी और तुमसे स्नेह रखेगी और तब तुम्हें शीघ्र ही सनकादि (सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्कुमार) चारों कुमारों जैसे मुक्त पुरुषों के दर्शन हो सकेंगे।
 
तात्पर्य
 भगवान् विष्णु ने राजा पृथु को सलाह दी कि हर व्यक्ति वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन करे; तभी मनुष्य का इस संसार में, चाहे वह जिस स्थिति में रहे, मृत्यु के पश्चात्, मोक्ष निश्चित है किन्तु इस युग में वर्णाश्रम धर्म की पद्धति अस्त-व्यस्त हो चुकी है, अत: इन नियमों का कड़ाई से पालन कर पाना कठिन है। जीवन में पूर्णता प्राप्त करने का एकमात्र उपाय कृष्णचेतना का विकास करना है, जिस प्रकार वर्णाश्रम धर्म का पालन विविध पुरुषों द्वारा विभिन्न पदों पर रहते हुए किया जाता है। उसी प्रकार कृष्ण-चेतना के सिद्धान्तों का पालन प्रत्येक व्यक्ति द्वारा संसार के प्रत्येक भाग में किया जा सकता है।
यहाँ पर उल्लेख करने का विशेष अभिप्राय है कि मनुष्य को पराशर तथा मनु जैसे द्विजाग्य्रों अर्थात् अग्रणी ब्राह्मणों का अनुसरण करना चाहिए। इन ऋषियों ने पहले ही आदेश दे रखे हैं कि वर्णाश्रम धर्म के नियमों का किस प्रकार पालन किया जाये इसी प्रकार सनातन गोस्वामी तथा रूप गोस्वामी ने भगवान् के शुद्ध भक्त बनने के नियम दे रखे हैं। इसीलिए यह अनिवार्य है कि परम्परागत आचार्यों के उपदेशों का अनुसरण किया जाय, जिन्होंने परम्परा से गुरू से शिष्य तक पहँुचे, ज्ञान को प्राप्त किया है इस प्रकार भौतिक जीवन-यापन करते हुए तथा अपना पद छोड़े बिना भौतिक कल्मष के बन्धन से छूटा जा सकता है। इसीलिए भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने उपदेश दिया है कि मनुष्य को अपना घर बदलने की आवश्यकता नहीं है। उसे मात्र परम स्रोत (परम्परा) का श्रवण करके नियमों को जीवन में व्यवहृत करना होता है। इस प्रकार जीवन की परम सिद्धि—मुक्ति—को प्राप्त करके मनुष्य भगवान् के धाम को प्राप्त हो सकता है। दूसरे शब्दों में, जिस परिवर्तन की आवश्यकता है, वह शरीर में नहीं वरन् चेतना में होता है दुर्भाग्यवश इस युग में लोग शरीर के प्रति लगाव रखते हैं, आत्मा के प्रति नहीं। उन्होंने आत्मा नहीं, वरन् शरीर से सम्बद्ध अनेक वादों का आविष्कार कर लिया है।

प्रजातंत्र के इस युग में विधान के लिए अनेक सरकारी प्रतिनिधि मतदान करते हैं प्रतिदिन वे एक नया नियम निकालते हैं। किन्तु ये नियम अनुभवहीन बद्धजीवों द्वारा निर्मित कल्पना की उपज के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं, अत: उनसे मानव समाज को किसी प्रकार की राहत नहीं मिल सकती। प्राचीन काल में यद्यपि राजा निरंकुश होते थे, किन्तु वे ऋषियों-मुनियों द्वारा स्थापित नियमों का दृढ़ता से पालन करते थे। इससे देश के शासन में कोई त्रुटि नहीं आ पाती थी और सब कुछ ठीक रहता था। प्रजा पूर्णत: पवित्र होती थी और राजा वैध कर संग्रह करता था जिससे स्थिति सुखकर रहती थी। आजकल तथाकथित प्रशासकों का चुनाव ऐसे महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों में से होता है, जो केवल अपना स्वार्थ देखते हैं, उन्हें शास्त्रों का कोई ज्ञान नहीं होता। दूसरे शब्दों में, प्रशासनाधिकारी नितान्त मूर्ख तथा धूर्त होते हैं और सामान्य जनता शूद्र होती है। मूर्खों, धूर्त्तों तथा शूद्रों का यह सम्मिलन कभी भी संसार में शान्ति और सम्पन्नता नहीं ला सकता। इसीलिए हमें समाज में समय-समय पर युद्ध, साम्प्रदायिक झगड़े तथा भाई-भाई में संघर्ष इत्यादि जैसे उपद्रव देखने को मिलते हैं। ऐसी परिस्थितियों में वे न तो मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जा सकते हैं और न मन:शान्ति प्रदान कर सकते हैं भगवद्गीता में कहा गया है कि जो भी आडम्बरपूर्ण विचारों में जीता है और शास्त्रों से सम्बन्ध नहीं रखता वह कभी सफल नहीं होता और उसे न तो सुख मिल पाता है और न मृत्यु के पश्चात् मुक्ति।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥