श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 17

 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
स इत्थं लोकगुरुणा विष्वक्सेनेन विश्वजित् ।
अनुशासित आदेशं शिरसा जगृहे हरे: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; स:—उसने; इत्थम्—इस प्रकार; लोक-गुरुणा—समस्त लोकों के परम स्वामी द्वारा; विष्वक्सेनेन—भगवान् द्वारा; विश्व-जित्—विश्व पर विजय करने वाला (महाराज पृथु); अनुशासित:—आदेश दिया गया; आदेशम्—आदेश, आज्ञा; शिरसा—सिर से; जगृहे—स्वीकार किया; हरे:—भगवान् का ।.
 
अनुवाद
 
 महान् संत मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, इस प्रकार समस्त विश्व के जीतने वाले महाराज पृथु ने भगवान् के आदेशों को शिरोधार्य किया।
 
तात्पर्य
 मनुष्य को चाहिए कि भगवान् के चरणकमलों में नतमस्तक होकर उनके आदेशों को स्वीकार करे। इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान् द्वारा कही गई हर बात को उसी रूप में अत्यन्त ध्यानपूर्वक तथा सम्मान के साथ स्वीकार किया जाए। भगवान् के वचनों में किसी प्रकार का संशोधन या परिवर्धन हमारा कार्य नहीं,
जैसाकि आजकल के अनेक तथाकथित विद्वान् तथा स्वामी जो भगवद्गीता के वचनों पर अपनी टीका करते हैं वे ऐसा करने लगे हैं। यहाँ पर महाराज पृथु द्वारा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है कि किस प्रकार भगवान् के आदेश को स्वीकार किया जाये। परम्परा प्रणाली से ज्ञान प्राप्त करने की यही विधि है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥