श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 18

 
श्लोक
स्पृशन्तं पादयो: प्रेम्णा व्रीडितं स्वेन कर्मणा ।
शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
स्पृशन्तम्—स्पर्श करते हुए; पादयो:—पाँवों का; प्रेम्णा—हर्षातिरेकवश; व्रीडितम्—लज्जित; स्वेन—अपने ही; कर्मणा— कार्यों से; शत-क्रतुम्—राजा इन्द्र को; परिष्वज्य—हृदय से लगाकर; विद्वेषम्—ईर्ष्या; विससर्ज—त्याग दिया; ह—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 राजा इन्द्र जो सामने खड़ा था, अपने कार्यों से अत्यन्त लज्जित हुआ और राजा पृथु के चरणकमलों का स्पर्श पाने के लिए उनके समक्ष गिर पड़ा। किन्तु पृथु महाराज ने अत्यन्त हर्षातिरेक में उसे तुरन्त हृदय से लगा लिया और यज्ञ के अश्व को चुराने के कारण उत्पन्न समस्त ईर्ष्या त्याग दी।
 
तात्पर्य
 ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जब मनुष्य किसी वैष्णव के चरणकमलों के प्रति अपराध कर देता है और बाद में पछताता है। यहाँ पर भी हम देखते हैं कि यद्यपि स्वर्ग का राजा इन्द्र इतना शक्तिशाली था कि भगवान् विष्णु के साथ में था, किन्तु उसने अपने को महाराज पृथु के यज्ञ के घोड़े को चुराने के लिए अपराधी अनुभव किया। वैष्णव के चरणकमलों पर अपराध करने वाले को भगवान् कभी क्षमा नहीं करते। इसके अनेक दृष्टान्त मिलते हैं। परम योगी तथा महामुनि दुर्वासा ने अम्बरीष महाराज का अपमान किया, तो उन्हें अम्बरीष महाराज के चरणकमलों पर गिरना पड़ा।
इन्द्र ने राजा पृथु के चरणकमलों पर गिरने का विचार किया, किन्तु राजा इतना उदार वैष्णव था कि महाराज इन्द्र को अपने चरणों पर गिरने नहीं देना चाहता था, अपितु उसने तुरन्त उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। वे दोनों ही एक दूसरे पर क्रुद्ध थे और ईर्ष्यालु थे; किन्तु दोनों ही वैष्णव थे, अत: उन्हें अपनी ईर्ष्या के कारण को समंजित करना पड़ा। वैष्णवों के मध्य सहयोगी आचरण का यह सर्वोत्तम उदाहरण है। किन्तु आजकल लोग वैष्णव न होने के कारण आपस में निरन्तर झगड़ते रहते हैं और मानव जीवन का लक्ष्य पूरा किये बिना मृत्यु प्राप्त करते हैं। संसार में कृष्णभावनामृत आन्दोलन को प्रसारित करने की नितान्त आवश्यकता है, क्योंकि भले ही लोग कभी-कभी एक दूसरे पर रुष्ट तथा मनोमालिन्यपूर्ण रहें, किन्तु कृष्णभावनाभावित होने से ऐसी प्रतियोगिता, स्पर्धा तथा ईर्ष्या को बिना कठिनाई के समंजित किया जा सकता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥