श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 19

 
श्लोक
भगवानथ विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हण: ।
समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुज: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान्; अथ—तदनन्तर; विश्व-आत्मा—परमात्मा; पृथुना—राजा पृथु द्वारा; उपहृत—प्रदत्त; अर्हण:—पूजा की सारी सामग्री; समुज्जिहानया—क्रमश: वर्द्धित; भक्त्या—जिसकी भक्ति; गृहीत—पकड़ा हुआ; चरण-अम्बुज:—चरणकमल ।.
 
अनुवाद
 
 राजा पृथु ने अपने ऊपर कृपालु भगवान् के चरण-कमलों की प्रभूत पूजा की। इस प्रकार भगवान् के चरणकमलों की आराधना करते हुए भक्ति में महाराज पृथु का आनन्द क्रमश: बढ़ता गया।
 
तात्पर्य
 जब भक्त के शरीर में विविध प्रकार का भावातिरेक प्रकट हो तो समझना चाहिए कि भक्ति पूर्णता को प्राप्त हो चुकी है। दिव्य आनन्द के कई प्रकार हैं, यथा रोना, हँसना, गिरना, प्रमत्त के सदृश चिल्लाना इत्यादि ये सारे लक्षण कभी-कभी भक्त के शरीर में दिखते हैं। ये अष्ट-सात्त्विक विकार कहलाते हैं, जिनका अर्थ है आठ प्रकार के दिव्य रूपान्तर
इनका अनुकरण नहीं किया जा सकता, किन्तु जब भक्त सचमुच सिद्ध हो जाता है, तो ये सारे लक्षण उसके शरीर में दृष्टिगोचर होने लगते हैं। भगवान् तो भक्तवत्सल हैं, अर्थात् वे अपने विशुद्ध भक्त के प्रति स्नेह रखते हैं। अत: भक्त तथा भगवान् के बीच जो दिव्य आनन्दमय आदान-प्रदान होता है, वह इस जगत के कार्य-कलापों की तरह नहीं होता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥