श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 2

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
एष तेऽकार्षीद्भङ्गं हयमेधशतस्य ह ।
क्षमापयत आत्मानममुष्य क्षन्तुमर्हसि ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् विष्णु ने कहा; एष:—यह राजा इन्द्र; ते—तुम्हारा; अकार्षीत्—किया; भङ्गम्—उत्पात; हय— अश्व; मेध—यज्ञ; शतस्य—एक सौवें का; ह—निश्चय ही; क्षमापयत:—क्षमाप्रार्थी; आत्मानम्—तुम से; अमुष्य—उसको; क्षन्तुम्—क्षमा करने के लिए; अर्हसि—तुम्हें चाहिए ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् विष्णु ने कहा : हे राजा पृथु, स्वर्ग के राजा इन्द्र ने तुम्हारे सौवें यज्ञ में विघ्न डाला है। अब वह मेरे साथ तुमसे क्षमा माँगने के लिए आया है, अत: उसे क्षमा कर दो।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में आत्मानम् शब्द महत्त्वपूर्ण है। योगी तथा ज्ञानी एक दूसरे को (अथवा सामान्य पुरुष को भी) आत्मा कहकर सम्बोधित करते हैं, क्योंकि इन्द्रियातीत पुरुष जीवात्मा को शरीर कभी नहीं मानता। चूँकि आत्मा भगवान्
का अंश होता है, अत: आत्मा तथा परम-आत्मा में गुणात्मक अन्तर नहीं होता। जैसाकि अगले श्लोक में बताया जाएगा, शरीर तो बाह्यावरण मात्र है, अत: सिद्ध इन्द्रियातीत पुरुष स्वयं में तथा अन्य में भेद नहीं मानता।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥