श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 4

 
श्लोक
पुरुषा यदि मुह्यन्ति त्वाद‍ृशा देवमायया ।
श्रम एव परं जातो दीर्घया वृद्धसेवया ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
पुरुषा:—लोग; यदि—यदि; मुह्यन्ति—मोहग्रस्त होते हैं; त्वादृशा:—तुम्हारी तरह; देव—परमेश्वर की; मायया—माया से; श्रम:—परिश्रम; एव—निश्चय ही; परम्—एकमात्र; जात:—उत्पन्न; दीर्घया—दीर्घकाल तक; वृद्ध-सेवया—गुरुजनों की सेवा से ।.
 
अनुवाद
 
 यदि तुम जैसे पुरुष, जो पूर्व आचार्यों के आदेशों के अनुसार कार्य करने के कारण इतने उन्नत हैं, मेरी माया से मोहग्रस्त हो जाँय तो तुम्हारी समस्त सिद्धि को समय का अपव्यय मात्र ही समझा जाएगा।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में वृद्ध-सेवया शब्द महत्त्वपूर्ण है। वृद्ध का अर्थ “बूढ़ा” और सेवया का अर्थ “सेवा द्वारा” है। पूर्णज्ञान तो आचार्यों या मुक्त जीवों से प्राप्त होता है। परम्परा-पद्धति के द्वारा प्रशिक्षित हुए बिना ज्ञान अर्जन में
कोई भी परिपूर्ण नहीं हो सकता। पृथु महाराज को इसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त थी, अत: उन्हें सामान्य व्यक्ति नहीं माना जा सकता था। सामान्य मनुष्य को केवल देहात्मबुद्धि होती है, जिससे वह प्रकृति के गुणों से सदैव मोहग्रस्त रहता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥