श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 9

 
श्लोक
य: स्वधर्मेण मां नित्यं निराशी: श्रद्धयान्वित: ।
भजते शनकैस्तस्य मनो राजन् प्रसीदति ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो भी; स्व-धर्मेण—अपने वृत्तिपरक कार्यों के द्वारा; माम्—मुझको; नित्यम्—नियमित रूप से; निराशी:—बिना किसी उद्देश्य के; श्रद्धया—श्रद्धा तथा भक्ति से; अन्वित:—युक्त; भजते—पूजता है; शनकै:—धीरे-धीरे; तस्य—उसका; मन:—मन; राजन्—हे राजा पृथु; प्रसीदति—पूर्णतया तुष्ट हो जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् विष्णु ने आगे कहा : हे राजा पृथु, जब कोई अपना वृत्तिपरक कर्म करता हुआ, किसी भौतिक लाभ के उद्देश्य के बिना मेरी सेवा में लगा रहता है, तो वह अपने अन्त:करण में उत्तरोत्तर संतुष्टि प्राप्त करता है।
 
तात्पर्य
 विष्णु पुराण से भी इस श्लोक की पुष्टि होती है। वृत्तिपरक कार्य को वर्णाश्रम धर्म कहते हैं और यह भौतिक तथा आध्यात्मिक जीवन के चारों वर्णों और आश्रमों पर लागू होता है—यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। जो कोई वर्णाश्रम धर्म पद्धति के अनुसार कर्म करता है और फल की इच्छा नहीं करता, वह क्रमश: सन्तुष्ट होता जाता है। जीवन का परम उद्देश्य वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए भगवान् की भक्ति करना है। भगवद्गीता में इस प्रक्रम को कर्मयोग कहा गया है। दूसरे शब्दों में, हमें केवल भगवान् की तुष्टि तथा सेवा के लिए कर्म करना चाहिए। अन्यथा हम कर्मफलों के बंधन में उलझ जाएँगे।
प्रत्येक व्यक्ति वर्णाश्रम धर्म में लगा हुआ है, किन्तु भौतिक व्यवसायों का उद्देश्य भौतिक लाभ नहीं होना चाहिए, अपितु हर एक को चाहिए कि अपने-अपने कर्मों के फल भगवान् को अर्पण करे। ब्राह्मण को विशेष रूप से अपना कर्म भौतिक लाभ की दृष्टि से न करके भगवान् को प्रसन्न करने के लिए करना चाहिए। क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र को भी इसी प्रकार से कर्म करना चाहिए। इस भौतिक जगत् में हर व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यवसाय में लगा है, किन्तु ऐसे कर्मों का उद्देश्य भगवान् को प्रसन्न रखना होना चाहिए। भक्ति अत्यन्त सरल है और कोई भी इसे अपना सकता है। जो जिस रूप में है, वैसे ही रहे; उसे अपने घर में परमेश्वर के अर्चा-विग्रह को स्थापित-भर करना होगा। यह विग्रह राधा-कृष्ण का हो या लक्ष्मी-नारायण का हो। (भगवान् के अनेक अन्य रूप भी हैं)। इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र अपने सच्चे परिश्रम के बल पर अर्चा-विग्रह को पूज सकता है। चाहे जो भी वर्णाश्रम धर्म हो, मनुष्य को श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पूजन, समर्पण इत्यादि के द्वारा भक्ति करनी चाहिए। इस प्रकार मनुष्य अपने को भगवान् की भक्ति में बड़ी आसानी से लगा सकता है। जब भगवान् किसी की सेवा से प्रसन्न हो जाते हैं, तो जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥