श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 1

 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
मौक्तिकै: कुसुमस्रग्भिर्दुकूलै: स्वर्णतोरणै: ।
महासुरभिभिर्धूपैर्मण्डितं तत्र तत्र वै ॥ १॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; मौक्तिकै:—मोतियों से; कुसुम—फूलों की; स्रग्भि:—मालाओं से; दुकूलै:—वस्त्र से; स्वर्ण— सुनहले; तोरणै:—द्वारों से; महा-सुरभिभि:—अत्यधिक सुगन्धित; धूपै:—धूप (सुगन्धित द्रव्य) से; मण्डितम्—अलंकृत; तत्र तत्र—वहाँ-वहाँ; वै—निश्चय ही ।.
 
अनुवाद
 
 महर्षि मैत्रेय ने विदुर से कहा : जब राजा ने अपनी नगरी में प्रवेश किया, तो उसके स्वागत के लिए नगरी को मोतियों, पुष्पहारों, सुन्दर वस्त्रों तथा सुनहरे द्वारों से सुन्दर ढंग से सजाया गया था और सारी नगरी अत्यन्त सुगन्धित धूप से सुवासित थी।
 
तात्पर्य
 वास्तविक ऐश्वर्य तो प्राकृतिक देन से मिलता है यथा सोना, चाँदी, मोती, मणि, ताजे पुष्प, वृक्ष तथा रेशम। वैदिक सभ्यता भगवान् की इन्हीं प्राकृतिक देनों को ऐश्वर्य तथा अलकंरण
मानती है। ऐसे ऐश्वर्य से मानसिक दशा तुरन्त बदल जाती है और पूरे वातावरण का अध्यात्मीकरण हो जाता है। राजा पृथु की राजधानी ऐसे ही अमूल्य ऐश्वर्यमय अलंकरणों से सजाई गई थी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥