श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 11

 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
गङ्गायमुनयोर्नद्योरन्तरा क्षेत्रमावसन् ।
आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; गङ्गा—गंगा नदी; यमुनयो:—यमुना नदी के; नद्यो:—दो नदियों के; अन्तरा—मध्यवर्ती; क्षेत्रम्—भूमि में; आवसन्—रहते हुए; आरब्धान्—प्रारब्धवश; एव—सदृश; बुभुजे—भोग किया; भोगान्—सम्पत्ति; पुण्य— पवित्र कार्य; जिहासया—कम करने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ऋषि ने विदुर से कहा : हे विदुर, राजा पृथु गंगा तथा यमुना इन दो महान् नदियों के मध्यवर्ती भूभाग में रहते थे। वे अत्यन्त ऐश्वर्यवान थे, अत: ऐसा प्रतीत होता था मानो अपने पूर्व पुण्यों के फल को कम करने के लिए ही प्रारब्ध से प्राप्त सम्पत्ति का भोग कर रहे थे।
 
तात्पर्य
 “पवित्र” तथा “अपवित्र” शब्द केवल सामान्य प्राणी के कर्मों के सम्बन्ध में लागू होते हैं। किन्तु महाराज पृथु को तो साक्षात् भगवान् विष्णु से शक्ति प्राप्त थी, अत: उन पर पवित्र तथा अपवित्र कार्यों का फल लागू नहीं होता। जैसाकि हम पहले कह चुके है, भगवान् जब किसी कार्य विशेष के उद्देश्य से किसी जीव को विशेष शक्ति प्रदान करते हैं, तो उसे शक्त्यावेश अवतार कहा जाता है, किन्तु पृथु महाराज शक्त्यावेश अवतार के साथ-साथ महान् भक्त भी थे। भक्त को विगत कर्मों का फल नहीं भोगना पड़ता। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है—कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजाम्— भगवान् द्वारा भक्तों के पूर्व पुण्य तथा पापों के फल निरस्त कर दिए जाते हैं। आरब्धान् एव शब्दों का अर्थ है “मानो पूर्व कर्मों द्वारा प्राप्त,” किन्तु पृथु महाराज के लिए
पूर्व कर्मों के फल की बात ही नहीं उठती, अत: यहाँ पर एव शब्द सामान्य पुरुषों से तुलना के अर्थ में प्रयुक्त है। भगवान् भगवद्गीता में कहते हैं—अवजानन्ति मां मूढा:। इसका यह अर्थ हुआ कि कभी-कभी लोग भगवान् के अवतार को सामान्य पुरुष मान लेते हैं। भले ही परमेश्वर, उनके अवतार या भक्त अपने को सामान्य व्यक्ति मानें, किन्तु उन्हें कभी भी ऐसा नहीं मानना चाहिए। न ही ऐसे व्यक्ति को अवतार या भक्त मान लेना चाहिए जो शास्त्रों तथा आचार्यों के प्रामाणिक वचनों के द्वारा पुष्ट न होता हो। शास्त्र के प्रमाण से सनातन गोस्वामी ने भगवान् चैतन्य महाप्रभु को श्रीकृष्ण का साक्षात् अवतार मान लिया, यद्यपि भगवान् चैतन्य ने इस तथ्य को कभी प्रकट नहीं किया। इसीलिए यह कहा जाता है कि आचार्य या गुरु को कभी सामान्य व्यक्ति नहीं समझना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥